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ग़ज़ल

फ़लक ने गर किया रुख़्सत मुझे सैर-ए-बयाबाँ को

फ़लक ने गर किया रुख़्सत मुझे सैर-ए-बयाबाँ को

यह ग़ज़ल विरह की गहन भावना और जीवन की कठिनाइयों के बीच मानवीय नियति के संघर्ष को दर्शाती है। कवि बताता है कि कैसे फ़लक (आकाश) ने उसे रेगिस्तान की सैर के लिए विवश किया, जिससे वह अपनी आंतरिक पीड़ा और बेचैनी को व्यक्त करता है। यह रचना जीवन के कठिन पड़ावों और प्रेम की जटिलता को एक दार्शनिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है।

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1
फ़लक ने गर किया रुख़्सत मुझे सैर-ए-बयाबाँ को निकाला सर से मेरे जाए मू ख़ार-ए-मुग़ीलाँ को
अगर आसमान ने मुझे रेगिस्तान की सैर के लिए छोड़ दिया, तो वह मेरे सिर से भटकते बकरी के बालों को निकाल लेगा।
2
वो ज़ालिम भी तो समझे कह रखा है हम ने याराँ को कि गोरिस्तान से गाड़ें जुदा हम अहल-ए-हिज्राँ को
वह ज़ालिम भी तो समझ गए, यह कह दिया है हमने अपने दोस्तों को, कि हम बिछोह के लोगों से कब्रिस्तान से अलग हो जाएंगे।
3
नहीं ये बेद-ए-मजनूँ गर्दिश-ए-गरदून-ए-गर्दां ने बनाया है शजर क्या जानिए किस मू परेशाँ को
ये बेद-ए-मजनूँ और गर्दिश-ए-गरदून-ए-गर्दां ने मिलकर क्या जान पाए कि इस पेड़ को किस बेचैन व्यक्ति ने बनाया है।
4
हुए थे जैसे मर जाते पर अब तो सख़्त हसरत है किया दुश्वार नादानी से हम ने कार-ए-आसाँ को
पहले ऐसा था जैसे मरने वाले हों, पर अब तो बहुत तीव्र लालसा है। हमने नादानी से जो काम आसान था, उसे मुश्किल बना दिया।
5
कहीं नस्ल आदमी की उठ न जावे इस ज़माने में कि मोती आब-ए-हैवाँ जानते हैं आब-ए-इंसाँ को
कहीं नस्ल आदमी की उठ न जावे इस ज़माने में, कि मोती आब-ए-हैवाँ जानते हैं आब-ए-इंसाँ को। इसका अर्थ है कि इस युग में ऐसा समय न आ जाए जब मोती केवल पशुओं के पानी को जानते हों, न कि मनुष्य के पानी को।
6
तुझे गिर चश्म-ए-इबरत है तो आँधी और बगूले से तमाशा कर ग़ुबार-अफ़्शानी ख़ाक-ए-अज़ीज़ाँ को
यदि तुम्हारी आँखें दुख का दर्पण हैं, तो आँधी और कबूतरों से मिलकर प्रियजन की राख पर धूल उड़ाने का तमाशा करो।
7
लिबास-ए-मर्द-ए-मैदाँ जौहर-ए-ज़ाती किफ़ायत है नहीं पिरोए पोशिश मा'रके में तेग़-ए-उर्यां को
मैदान के योद्धा का वस्त्र स्वयं के सार की पर्याप्तता है, न कि बाज़ार में बुनी हुई पोशाक, बल्कि सीने की तलवार है।
8
हवा-ए-अब्र में गर्मी नहीं जो तू न हो साक़ी दम अफ़्सुर्दा कर दे मुंजमिद रशहात-ए-बाराँ को
शायर कहता है कि अगर तुम साक़ी (शराब पिलाने वाला) नहीं हो, तो बादलों की हवा में कोई गर्मी नहीं है; और वह कहता है कि मेरा दम (जीवन) उस बारिश की ठंडी मस्ती को थका दे।
9
जलें हैं कब की मिज़्गाँ आँसुओं की गर्म-जोशी से उस आब-ए-चश्म की जोशिश ने आतिश दी नीस्ताँ को
मेरी आँखों की लाली कब आँसुओं की गरमाहट से जल पाई, उस आँसू भरे नयन की जोश ने रात में आग लगा दी।
10
वो काफ़िर इश्क़ का है दिल कि मेरी भी रग-ए-जाँ तक सदा ज़ुन्नार ही तस्बीह है उस ना-मुसलमाँ को
चाहे वह काफ़िर का दिल हो या मेरी रग-ए-जाँ तक, उस ना-मुसलमाँ के लिए केवल 'ज़ुन्नार' ही तस्बीह है।
11
ग़ुरूर-ए-नाज़ से आँखें न खोलीं इस जफ़ा-जू ने मिला पाँव तले जब तक न चश्म-ए-सद-ग़ज़ालाँ को
घमंड भरी अदा से आँखें नहीं खुलीं इस क्रूरता भरे युग ने, जब तक कि पाँव तले हिरनी जैसी निगाहों का झरना नहीं मिला।
12
न सी चश्म-ए-तमा ख़्वान-ए-फ़लक पर ख़ाम-दसती से कि जाम-ए-ख़ून दे है हर सहर ये अपने मेहमाँ को
न सी चश्म-ए-तमा ख़्वान-ए-फ़लक पर ख़ाम-दसती से कि जाम-ए-ख़ून दे है हर सहर ये अपने मेहमाँ को। अर्थात, यह न तो प्रेमी की आँख है और न ही आसमान का मयखाना, बल्कि यह तो हर सुबह अपने मेहमान को काँपते हाथों से ख़ून का जाम पिलाता है।
13
ज़ि-बस सिर्फ़ जुनूँ मेरे हुआ आहन अजब मत कर न हो गर हल्क़ा-ए-दर ख़ाना-ए-ज़ंजीर-साज़ाँ को
बस यह जुनूँ मेरा हुआ आहन अजब मत कर, न हो गर हल्क़ा-ए-दर ख़ाना-ए-ज़ंजीर-साज़ाँ को।
14
बने ना-वाक़िफ़-ए-शादी अगर हम बज़्म-ए-इशरत में दहान-ए-ज़ख़म-ए-दिल समझे जो देखा रू-ए-ख़ंदाँ को
अगर हम जश्न के माहौल में ख़ुश न हों, तो हम हँसी के चेहरे को देखकर दिल के ज़ख़्म का मुँह कैसे समझ सकते हैं।
15
नहीं रेग-ए-रवाँ मजनूँ के दिल की बे-क़रारी ने किया है मुज़्तरिब हर ज़रा-ए-गर्द-ए-बयाबाँ को
मजनूँ के दिल की बेचैनी ने नहीं, बल्कि हर कण ने इस उजाड़ रेगिस्तान को बेचैन कर दिया है।
16
किसी के वास्ते रूस्वा-ए-आलम हो पे जी में रख कि मारा जाए जो ज़ाहिर करे उस राज़-ए-पिन्हाँ को
किसी के लिए दुनिया की शोहरत या बदनामी का गम दिल में रखो, क्योंकि अगर तुम वो गुप्त बात कह दोगे तो तुम्हें मार दिया जाएगा।
17
गिरी पड़ती है बिजली ही तभी से ख़िर्मन गुल पर टक इक हंस मेरे रोने पर कि देखे तेरे दंदाँ को
बिजली का गिरना और हंस का मेरे रोने पर देखना, ये दोनों दृश्य कवि के लिए एक कल्पना है, जो किसी खास पल या घटना के महत्व को दर्शाती है।
18
ग़ुरूर-ए-नाज़-ए-क़ातिल को लिए जा है कोई पूछे चला तो सौंप कर किस के तईं उस सैद-ए-बे-जाँ को
किसी भी व्यक्ति के लिए घातक आकर्षण का घमंड कौन ले जा सकता है? यदि वह चला जाता है, तो उस निर्जीव सैयद को किसके पास सौंप दिया जाए।
19
वो तुख़्म-ए-सोख़्ता थे हम कि सर-सब्ज़ी न की हासिल मिलाया ख़ाक में दाना नमत हसरत से दहक़ाँ को
हम सूखे हुए बीजों के समान थे, जिनमें हरियाली का विकास नहीं हो सका; हमने धूल में दाने बिखेरे, जो चाहत और हँसी से जन्मी एक कृपा थी।
20
हुआ हूँ गुंचा-ए-पज़मुर्दा आख़िर फ़स्ल का तुझ बिन न दे बरबाद हसरत कुश्ता-ए-सर-दर-गरेबाँ को
तुझ बिन आख़िर फ़स्ल का मैं गुंचा-ए-पज़मुर्दा हो गया हूँ, इसलिए मुझे यह हसरत न दे कि मैं अपना सिर (जीवन) किसी पराई जगह पर संघर्ष करूँ।
21
ग़म-ओ-अंदोह-ओ-बे-ताबी अलम बे-ताक़ती हिरमाँ कहूँ ऐ हम-नशीं ता-चंद ग़म-हा-ए-फ़िरावाँ को
मैं अपने हम-नशीं से कहते हूँ कि मैं ग़म, अंदोह, बेताबी, और शक्तिहीन दर्द की बात करता हूँ, साथ ही कुछ बिखरे हुए दुख भी।
22
गुल-ओ-सर्व-ओ-समन गिर जाएँगे मत सैर-ए-गुलशन कर मिला मत ख़ाक में उन बाग़ के रा'ना जवानाँ को
गुल-ओ-सर्व-ओ-समन गिर जाएँगे मत और बाग़ की सैर मत करो; उन बागों के नौजवान मालिकों से धूल में मिलना मत।
23
बहुत रोए जो हम ये आस्तीं रख मुँह पे ऐ बिजली न चश्म-ए-कम से देख उस यादगार-ए-चश्म-ए-गिर्याँ को
ऐ बिजली, हमने तुझ पर बहुत आँसू बहाए हैं, इसलिए कृपा करके अपनी कमज़ोर निगाहों से उन आँसू भरी आँखों की याद को मत देखना।
24
मिज़ाज उस वक़्त है इक मतला-ए-ताज़ा पे कुछ माइल कि बे-फ़िक्र सुख़न बनती नहीं हरगिज़ सुख़न-दाँ को
मन अभी एक ताज़े मतले की ओर कुछ दूर है, कि एक शब्द-रचना करने वाले के लिए बेफ़िक्र होकर कभी भी कोई बात नहीं बनती।
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