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वो तुख़्म-ए-सोख़्ता थे हम कि सर-सब्ज़ी न की हासिल
मिलाया ख़ाक में दाना नमत हसरत से दहक़ाँ को

We were seeds of withered wood, incapable of flourishing with greenery; we scattered grains in the dust, a gift born of yearning and laughter.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

हम सूखे हुए बीजों के समान थे, जिनमें हरियाली का विकास नहीं हो सका; हमने धूल में दाने बिखेरे, जो चाहत और हँसी से जन्मी एक कृपा थी।

विस्तार

यह शेर उस दर्द को बयान करता है जब कोशिशें पूरी हों, लेकिन मंज़िल हासिल न हो पाए। शायर कहते हैं कि हम तो सूखी ज़मीन के बीज जैसे थे, जिनमें सर-सब्ज़ी निकलना मुमकिन नहीं था। फिर भी हमने ख़ाक में एक दाना बोया... और उसे अपनी हसरत, अपने प्यार से सींचा। यह पूरी कोशिश के बाद भी नाकाम रहने के एहसास को बयां करता है।

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