कहीं नस्ल आदमी की उठ न जावे इस ज़माने में कि मोती आब-ए-हैवाँ जानते हैं आब-ए-इंसाँ को

“In this age, lest the race of man should rise, that pearls know the water of man, not the water of animals.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

कहीं नस्ल आदमी की उठ न जावे इस ज़माने में, कि मोती आब-ए-हैवाँ जानते हैं आब-ए-इंसाँ को। इसका अर्थ है कि इस युग में ऐसा समय न आ जाए जब मोती केवल पशुओं के पानी को जानते हों, न कि मनुष्य के पानी को।

विस्तार

यह शेर इंसान की रूह की गहराई को बयान करता है। शायर कहते हैं कि कहीं ऐसा ज़माना आएगा जब इंसानी एहसास इतना गहरा होगा.... कि मोती भी, जो कि निखरत और सादगी का प्रतीक हैं, हमारे अंदर की नब्ज़ को पहचान लेंगे। यह इंसानी जज़्बात की असीमित गहराई का इक़रार है।

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