न सी चश्म-ए-तमा ख़्वान-ए-फ़लक पर ख़ाम-दसती से कि जाम-ए-ख़ून दे है हर सहर ये अपने मेहमाँ को

“Not the eye of the lover, nor the tavern of the sky, but with unsteady hands, every morning gives a cup of blood to its own guest.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

न सी चश्म-ए-तमा ख़्वान-ए-फ़लक पर ख़ाम-दसती से कि जाम-ए-ख़ून दे है हर सहर ये अपने मेहमाँ को। अर्थात, यह न तो प्रेमी की आँख है और न ही आसमान का मयखाना, बल्कि यह तो हर सुबह अपने मेहमान को काँपते हाथों से ख़ून का जाम पिलाता है।

विस्तार

यह शेर मोहब्बत के उस दर्द को बयां करता है, जो नज़रों में होता है। शायर कहते हैं कि महबूब की निगाहें न तो आसमान की साफ़ हैं, न ही ये हल्की-फुल्की हैं। क्यों? क्योंकि ये हर सुबह अपने महबूब को ख़ून का जाम पिलाती हैं। यह शिकायत है कि प्यार इतना ज़हरीला है कि इसमें हर पल दर्द छिपा है। मिर् तकी मीर ने इस एहसास को बहुत गहराई से बयान किया है।

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