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वो ज़ालिम भी तो समझे कह रखा है हम ने याराँ को
कि गोरिस्तान से गाड़ें जुदा हम अहल-ए-हिज्राँ को

Even that cruel one understood, we had told our friends, That we would separate from the garden of the dead, the people of separation.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

वह ज़ालिम भी तो समझ गए, यह कह दिया है हमने अपने दोस्तों को, कि हम बिछोह के लोगों से कब्रिस्तान से अलग हो जाएंगे।

विस्तार

यह शेर बिछड़न के दर्द को बयां करता है। शायर यहाँ 'ज़ालिम' (यानी महबूब या किस्मत) को संबोधित कर रहे हैं। वह कह रहे हैं कि ज़ालिम को यह भ्रम है कि हमने अपने दोस्तों को बता दिया है कि हम हिज्र के माहौल से, इस तन्हाई के ज gathering से दूर हो जाएँगे। पर असल दर्द तो बस इस बात का है कि हमारी पहचान ही इस दर्द और इस विरह से है।

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