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ग़म-ओ-अंदोह-ओ-बे-ताबी अलम बे-ताक़ती हिरमाँ
कहूँ ऐ हम-नशीं ता-चंद ग़म-हा-ए-फ़िरावाँ को

Oh my companion, I speak of sorrows, distresses, and restlessness, of a pain without strength, of the deprivation, and a handful of scattered woes.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

मैं अपने हम-नशीं से कहते हूँ कि मैं ग़म, अंदोह, बेताबी, और शक्तिहीन दर्द की बात करता हूँ, साथ ही कुछ बिखरे हुए दुख भी।

विस्तार

यह शेर सिर्फ़ ग़म की बात नहीं करता, बल्कि उस बेचैनी की बात करता है जो दिल में बस जाती है। मिर्ज़ा तय़मिर अपने हम-नशीं को बुलाकर, अपने मन के उन गहरे, अनियंत्रित ग़मों का इज़हार कर रहे हैं। यह दर्द सिर्फ़ आंखों का नहीं, यह रूह का दर्द है, जो हर दोस्त के साथ साझा किया जाता है। एक गहरा, उदास एहसास!

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