वो काफ़िर इश्क़ का है दिल कि मेरी भी रग-ए-जाँ तक
सदा ज़ुन्नार ही तस्बीह है उस ना-मुसलमाँ को
“Whether it is a disbeliever's heart or my very lifeblood, for that un-Muslim, only 'Zunnar' (a form of devotion) is the prayer bead.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
चाहे वह काफ़िर का दिल हो या मेरी रग-ए-जाँ तक, उस ना-मुसलमाँ के लिए केवल 'ज़ुन्नार' ही तस्बीह है।
विस्तार
यह शेर आशिक़ के गहरे निराशा भरे एहसास को बयां करता है। शायर कहते हैं कि महबूब का दिल इश्क़ में काफ़िर है, वो हमारे प्यार को कोई पवित्र चीज़ नहीं मानता। वो हमारे वफ़ादारी को सिर्फ़ एक रस्म, एक आदत की तरह समझता है—जैसे कोई माला जपना, जिसमें कोई सच्ची आस्था न हो।
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