वली दकनी
उनका संकलन 'कुल्लियात-ए-वली' उर्दू ग़ज़ल का ऐतिहासिक और बुनियादी ग्रंथ माना जाता है। "देखना हर सुब्ह तुझ रुख़्सार का" और "फ़िदा-ए-दिलबर-ए-रंगीं-अदा हूँ" जैसी ग़ज़लें उनके काव्य-सौंदर्य और भावुक अंदाज़ का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
वली ने फ़ारसी काव्य-शिल्प और बह्रों को भारतीय मुहावरे और दकनी भाषा के साथ जोड़कर एक मधुर शैली विकसित की। उनकी शायरी में हुस्न-ओ-इश्क़ के नाज़ुक जज़्बात, मौसीक़ी और सहज सादगी का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
साहित्यिक जगत में उन्हें 'बाबा-ए-रेख़्ता' के नाम से जाना जाता है और उन्हें उत्तर एवं दक्षिण भारत की साझी काव्य-संस्कृति का सेतु माना जाता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
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