ग़ज़ल

मुश्ताक़ हैं उश्शाक़ तिरी बाँकी अदा के

مشتاق ہیں عشاق تری بانکی ادا کے
वली दकनी· Ghazal· 5 shers· radif: के

यह ग़ज़ल महबूब की मनमोहक और बाँकी अदाओं, हुस्न और उसके नाज़-ओ-सितम के प्रति आशिक़ों के गहरे सम्मोहन को दर्शाती है। इसमें प्रेमी के हर अंदाज़ और लिबास के आकर्षण में दीवानों के दिल बँधे होने तथा इश्क़ की तड़प को ख़ूबसूरती से बयां किया गया है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
अभी गीत नहीं
लिपि व अर्थ
1
मुश्ताक़ हैं उश्शाक़ तिरी बाँकी अदा के ज़ख़्मी हैं मोहिब्बाँ तिरी शमशीर-ए-जफ़ा के
2
हर पेच में चीरे के तिरे लिपटे हैं आशिक़ आलम के दिलाँ बंद हैं तुझ बंद-ए-क़बा के
3
लर्ज़ां है तिरे दस्त अगे पंजा-ए-ख़ुर्शीद तुझ हुस्न अगे मात मलाएक हैं समा के
4
तुझ ज़ुल्फ़ के हल्क़े में है दिल बे-सर ओ बे-पा टुक मेहर करो हाल उपर बे-सर-ओ-पा के
5
तन्हा न 'वली' जग मुनीं लिखता है तिरे वस्फ़ दफ़्तर लिखे आलम ने तिरी मद्ह-ओ-सना के
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.

मुश्ताक़ हैं उश्शाक़ तिरी बाँकी अदा के | Sukhan AI