ग़ज़ल
इश्क़ में सब्र-ओ-रज़ा दरकार है
عشق میں صبر و رضا درکار ہے
यह ग़ज़ल प्रेम के मार्ग में धैर्य, निष्ठा और आत्मसमर्पण की अनिवार्यता को उजागर करती है। इसमें प्रेमी के इम्तिहानों और प्रियतम के सम्मुख सब्र-ओ-क़रार के खो जाने की भावनात्मक स्थिति का सुंदर चित्रण है।
Source: rekhta · HI
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1
इश्क़ में सब्र-ओ-रज़ा दरकार है
फ़िक्र-ए-असबाब-ए-वफ़ा दरकार है
2
चाक करने जामा-ए-सब्र-ओ-क़रार
दिलबर-ए-रंगीं क़बा दरकार है
3
हर सनम तस्ख़ीर-ए-दिल क्यूँकर सके
दिलरुबाई कूँ अदा दरकार है
4
ज़ुल्फ़ कूँ वा कर कि शाह-ए-इश्क़ कूँ
साया-ए-बाल-ए-हुमा दरकार है
5
रख क़दम मुझ दीदा-ए-ख़ूँ-बार पर
गर तुझे रंग-ए-हिना दरकार है
6
देख उस की चश्म-ए-शहला कूँ अगर
नर्गिस-ए-बाग़-ए-हया दरकार है
7
अज़्म उस के वस्ल का है ऐ 'वली'
लेकिन इमदाद-ए-ख़ुदा दरकार है
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