ग़ज़ल
मैं तुझे आया हूँ ईमाँ बूझ कर
میں تجھے آیا ہوں ایماں بوجھ کر
इस ग़ज़ल में शायर अपने महबूब के प्रति असीम समर्पण और श्रद्धा भाव प्रकट करता है, उसे अपने ईमान और आत्मिक सुकून का स्रोत मानता है। महबूब के अनुपम सौंदर्य को गुलिस्ताँ मानकर रूहानी इश्क़ और आंतरिक शांति की तलाश को संजीदगी से बयां किया गया है।
Source: rekhta · HI
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1
मैं तुझे आया हूँ ईमाँ बूझ कर
बाइ'स-ए-जमइय्यत-ए-जाँ बूझ कर
2
बुलबुल-ए-शीराज़ कूँ करता हूँ याद
हुस्न कूँ तेरे गुलिस्ताँ बूझ कर
3
दिल चला है इश्क़ का हो जौहरी
लब तिरे ला'ल-ए-बदख़्शाँ बूझ कर
4
हर न करती है नज़ारे की मशक़
ख़त कूँ तेरे ख़त्त-ए-रैहाँ बूझ कर
5
ऐ सजन आया हूँ हो बे-इख़्तियार
तुझ कूँ अपना राहत-ए-जाँ बूझ कर
6
ज़ुल्फ़ तेरी क्यूँ न खाए पेच-ओ-ताब
हाल मुझ दिल का परेशाँ बूझ कर
7
रहम कर उस पर कि आया है 'वली'
दर्द-ए-दिल का तुझ कूँ दरमाँ बूझ कर
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