ग़ज़ल
जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे
جسے عشق کا تیر کاری لگے
यह ग़ज़ल इश्क़ की गहरी चोट और उसमें निहित अनन्य निष्ठा की मार्मिक अभिव्यक्ति है। इसमें बताया गया है कि प्रेम के तीर से घायल प्रेमी के लिए सांसारिक जीवन भारी और कष्टप्रद हो जाता है, फिर भी वह अंतिम सांस तक अपने महबूब से वफ़ा निभाता है।
Source: rekhta · HI
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1
जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे
उसे ज़िंदगी क्यूँ न भारी लगे
2
न छोड़े मोहब्बत दम-ए-मर्ग तक
जिसे यार-ए-जानी सूँ यारी लगे
3
न होवे उसे जग में हरगिज़ क़रार
जिसे इश्क़ की बे-क़रारी लगे
4
हर इक वक़्त मुझ आशिक़-ए-पाक कूँ
प्यारे तिरी बात प्यारी लगे
5
'वली' कूँ कहे तू अगर यक बचन
रक़ीबाँ के दिल में कटारी लगे
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