ग़ज़ल

देखना हर सुब्ह तुझ रुख़्सार का

دیکھنا ہر صبح تجھ رخسار کا
वली दकनी· Ghazal· 10 shers· radif: का

यह ग़ज़ल माशूक़ के अप्रतिम सौंदर्य और नूरानी चेहरे की प्रशंसा करती है, जिसके दर्शन को कवि सुबह के सूर्योदय और दैवीय प्रकाश के समान मानता है। इसमें प्रेमी के दिल की दीवानगी और समर्पण को बड़ी नफ़ासत से बयां किया गया है, जो महबूब के हुस्न पर परवाने और बुलबुल की तरह फिदा है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
देखना हर सुब्ह तुझ रुख़्सार का है मुताला मतला-ए-अनवार का
हर सुबह तुम्हारे चेहरे को देखना मानो उन तमाम रोशनी के उगने के स्थान (क्षितिज) का अध्ययन करना है।
2
बुलबुल ओ परवाना करना दिल के तईं काम है तुझ चेहरा-ए-गुल-नार का
दिल को बुलबुल और परवाना दोनों बना देना तुम्हारे सुर्ख़ लाल चेहरे का ही काम है।
3
सुब्ह तेरा दर्स पाया था सनम शौक़-ए-दिल मोहताज है तकरार का
हे प्रिय, सुबह तुम्हारा दीदार हुआ था, लेकिन मेरे दिल की चाहत तुम्हें बार-बार देखने की मोहताज है।
4
माह के सीने उपर ऐ शम्अ-रू दाग़ है तुझ हुस्न की झलकार का
ऐ शम्अ जैसे मुखड़े वाले महबूब, चाँद के सीने पर जो दाग़ है, वह वास्तव में तुम्हारे हुस्न की चमक का ही असर है।
5
दिल कूँ देता है हमारे पेच-ओ-ताब पेच तेरे तुर्रा-ए-तर्रार का
तुम्हारी चंचल और चालाक लट का घुमाव हमारे दिल को बेचैनी और तड़प में डाल देता है।
6
जो सुन्या तेरे दहन सूँ यक बचन भेद पाया नुस्ख़ा-ए-असरार का
जिसने भी तुम्हारे मुँह से एक भी बात सुनी, उसने रहस्यों की किताब का भेद पा लिया।
7
चाहता है इस जहाँ में गर बहिश्त जा तमाशा देख उस रुख़्सार का
अगर तुम इस दुनिया में स्वर्ग देखना चाहते हो, तो जाकर अपने महबूब के रुख़्सार (गाल) का दीदार करो।
8
आरसी के हाथ सूँ डरता है ख़त चोर कूँ है ख़ौफ़ चौकीदार का
चेहरे पर आने वाले बाल (ख़त) आईने से उसी तरह डरते हैं जिस तरह किसी चोर को चौकीदार का डर होता है।
9
सर-कशी आतिश-मिज़ाजी है सबब नासेहों को गर्मी-ए-बाज़ार का
मेरी नाफ़रमानी और उग्र स्वभाव ही वह वजह है जिसके कारण नसीहत देने वालों का बाज़ार गर्म रहता है और उन्हें उपदेश देने का भरपूर अवसर मिलता है।
10
ऐ 'वली' क्यूँ सुन सके नासेह की बात जो दिवाना है परी-रुख़्सार का
ऐ वली, जो इंसान किसी परी जैसे चेहरे वाले महबूब के प्यार में दीवाना हो, वह भला किसी समझाने वाले की नसीहत कैसे सुन सकता है?
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