ग़ज़ल

दिल कूँ तुझ बाज बे-क़रारी है

دل کوں تجھ باج بے قراری ہے
वली दकनी· Ghazal· 7 shers· radif: है

यह ग़ज़ल प्रियतम के विरह में तड़पते हृदय की गहरी बेचैनी और पीड़ा को व्यक्त करती है। इसमें जुदाई की रात में निरंतर बहते आंसुओं और विरह वेदना में आहें भरने को ही प्रेमी का एकमात्र सहारा बताया गया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
दिल कूँ तुझ बाज बे-क़रारी है चश्म का काम अश्क-बारी है
तेरे बिना मेरे दिल को बेक़रारी है और मेरी आँखों का काम बस आँसू बहाना रह गया है।
2
शब-ए-फ़ुर्क़त में मोनिस ओ हमदम बे-क़रारों कूँ आह-ओ-ज़ारी है
जुदाई की रात में बेचैन आशिक़ों का एकमात्र साथी और हमदम उनकी आहें और रोना-धोना ही होता है।
3
ऐ अज़ीज़ाँ मुझे नहीं बर्दाश्त संग-दिल का फ़िराक़ भारी है
हे प्यारे दोस्तों, मुझसे अब यह सहन नहीं होता, उस पत्थरदिल महबूब की जुदाई का ग़म बहुत भारी है।
4
फ़ैज़ सूँ तुझ फ़िराक़ के साजन चश्म-ए-गिर्यां का काम जारी है
हे प्रिय, तुम्हारी जुदाई की बरकत से मेरी रोती हुई आँखों का काम (आँसू बहाना) लगातार जारी है।
5
फ़ौक़ियत ले गया हूँ बुलबुल सूँ गरचे मंसब में दो-हज़ारी है
मैं बुलबुल से बाज़ी जीत गया हूँ और उससे आगे निकल गया हूँ, हालाँकि वह दर्जे और पदवी में दो-हज़ारी मनसबदार है।
6
इश्क़-बाज़ों के हक़ में क़ातिल की हर निगह ख़ंजर ओ कटारी है
इश्क़ करने वालों के लिए महबूब (क़ातिल) की हर एक नज़र ख़ंजर और कटारी की तरह घातक होती है।
7
आतिश-ए-हिज्र-ए-लाला-रू सूँ 'वली' दाग़ सीने में यादगारी है
ऐ वली, लाला जैसे सुर्ख़ चेहरे वाले महबूब की जुदाई की आग से मेरे सीने पर जो दाग़ लगा है, वह एक यादगार निशानी है।
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