ग़ज़ल

इश्क़ बेताब-ए-जाँ-गुदाज़ी है

عشق بیتاب جاں گدازی ہے
वली दकनी· Ghazal· 7 shers· radif: है

यह ग़ज़ल प्रेम की गहन तड़प और उसकी रूहानी पाकीज़गी को दर्शाती है, जहाँ इश्क़ में जान पिघलाने वाली बेताबी और हुस्न में दिलनवाज़ी का शौक है। इसमें इश्क़ को एक मुक़द्दस मज़हब बताया गया है, जिसमें दर्द, आँसुओं और आत्म-समर्पण से ही सच्ची बंदगी मुमकिन होती है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
इश्क़ बेताब-ए-जाँ-गुदाज़ी है हुस्न मुश्ताक़-ए-दिल-नवाज़ी है
इश्क़ अपनी जान को पिघलाने और मिटाने के लिए बेचैन है, जबकि हुस्न दिलों को बहलाने और उन पर मेहरबानी करने का इच्छुक है।
2
अश्क ख़ूनीं सूँ जो किया है वज़ू मज़हब-ए-इश्क़ में नमाज़ी है
3
जो हुआ राज़-ए-इश्क़ सूँ आगाह वो ज़माने का फ़ख़्र-ए-राज़ी है
4
पाक-बाज़ाँ सूँ यूँ हुआ मफ़्हूम इश्क़ मज़मून-ए-पाक-बाज़ी है
5
जा के पहुँची है हद्द-ए-ज़ुल्मत कूँ बस-कि तुझ ज़ुल्फ़ में दराज़ी है
6
तजरबे सूँ हुआ मुझे ज़ाहिर नाज़ मफ़्हूम बे-नियाज़ी है
7
ऐ 'वली' ऐश-ए-ज़ाहिरी का सबब जल्वा-ए-शाहिद-ए-मजाज़ी है
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इश्क़ बेताब-ए-जाँ-गुदाज़ी है | Sukhan AI