ग़ज़ल
किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम कूँ आब आहिस्ता आहिस्ता
کیا مجھ عشق نے ظالم کوں آب آہستہ آہستہ
यह ग़ज़ल प्रेम के धीमे किंतु गहरे और परिवर्तनकारी प्रभाव को दर्शाती है, जहाँ सच्चा इश्क़ समय के साथ कठोर दिल को भी पिघला देता है। गुलाब से अर्क बनने जैसे सुंदर रूपकों के माध्यम से शायर ने सब्र, भावनात्मक उपचार और महबूब के धीरे-धीरे बदलने का मार्मिक चित्रण किया है।
Source: rekhta · HI
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1
किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम कूँ आब आहिस्ता आहिस्ता
कि आतिश गुल कूँ करती है गुलाब आहिस्ता आहिस्ता
2
वफ़ादारी ने दिलबर की बुझाया आतिश-ए-ग़म कूँ
कि गर्मी दफ़ा करता है गुलाब आहिस्ता आहिस्ता
3
अजब कुछ लुत्फ़ रखता है शब-ए-ख़ल्वत में गुल-रू सूँ
ख़िताब आहिस्ता आहिस्ता जवाब आहिस्ता आहिस्ता
4
मिरे दिल कूँ किया बे-ख़ुद तिरी अँखियाँ ने आख़िर कूँ
कि ज्यूँ बेहोश करती है शराब आहिस्ता आहिस्ता
5
हुआ तुझ इश्क़ सूँ ऐ आतिशीं-रू दिल मिरा पानी
कि ज्यूँ गलता है आतिश सूँ गुलाब आहिस्ता आहिस्ता
6
अदा ओ नाज़ सूँ आता है वो रौशन-जबीं घर सूँ
कि ज्यूँ मशरिक़ सूँ निकले आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता
7
'वली' मुझ दिल में आता है ख़याल-ए-यार-ए-बे-परवा
कि ज्यूँ अँखियाँ मनीं आता है ख़्वाब आहिस्ता आहिस्ता
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