ग़ज़ल
आज दिस्ता है हाल कुछ का कुछ
آج دستا ہے حال کچھ کا کچھ
यह ग़ज़ल महबूब की शोख़ और चंचल अदाओं के कारण आशिक़ के दिल पर छाने वाली बेचैनी और हैरत को बयां करती है। प्रेम की इस अजब कैफियत में आशिक़ की मनोदशा और विचार पूरी तरह बदल जाते हैं और उसका दिल बेक़रार हो उठता है।
Source: rekhta · HI
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1
आज दिस्ता है हाल कुछ का कुछ
क्यूँ न गुज़रे ख़याल कुछ का कुछ
आज हालात बिल्कुल बदले हुए और अजीब दिखाई दे रहे हैं, तो फिर मन में तरह-तरह के अजीबोगरीब ख़्याल क्यों न आएं?
2
दिल-ए-बे-दिल कूँ आज करती है
शोख़ चंचल की चाल कुछ का कुछ
आज उस शोख़ और चंचल महबूब की चाल इस बेबस व उदास दिल की हालत पूरी तरह बदलकर कुछ का कुछ किए दे रही है।
3
मुजको लगता है ऐ परी-पैकर
आज तेरा जमाल कुछ का कुछ
हे परी जैसे रूप वाले महबूब, मुझे ऐसा लगता है कि आज तुम्हारा सौंदर्य कुछ बदला हुआ और बिल्कुल अलग ही नजर आ रहा है।
4
असर-ए-बादा-ए-जवानी है
कर गया हूँ सवाल कुछ का कुछ
यह जवानी के नशे का असर है कि मैं पूछना कुछ और चाहता था पर कुछ का कुछ और ही पूछ बैठा।
5
ऐ 'वली' दिल कूँ आज करती है
बू-ए-बाग़-ए-विसाल कुछ का कुछ
ऐ वली, आज मिलन के बाग़ की ख़ुशबू मेरे दिल को कुछ का कुछ (बेचैन और बेहाल) बनाए दे रही है।
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