ग़ज़ल
जिस दिलरुबा सूँ दिल कूँ मिरे इत्तिहाद है
جس دل ربا سوں دل کوں مرے اتحاد ہے
इस ग़ज़ल में शायर अपने प्रियतम के साथ दिल के गहरे जुड़ाव और आध्यात्मिक एकता को व्यक्त करता है, जहाँ प्रियतम का दीदार ही आँखों की सबसे बड़ी मुराद है। यह रचना निष्कपट प्रेम और सच्चे विश्वास को रेखांकित करती है, जिसमें एक निर्मल हृदय दर्पण की तरह महबूब के ख़याल को अपने भीतर संजोए रखता है।
Source: rekhta · HI
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1
जिस दिलरुबा सूँ दिल कूँ मिरे इत्तिहाद है
दीदार उस का मेरी अँखाँ की मुराद है
2
रखता है बर में दिलबर-ए-रंगीं ख़याल कूँ
मानिंद आरसी के जो साफ़ ए'तिक़ाद है
3
शायद कि दाम-ए-इश्क़ में ताज़ा हुआ है बंद
वादे पे गुल-रुख़ाँ के जिसे ए'तिमाद है
4
बाक़ी रहेगा जौर-ओ-सितम रोज़-ए-हश्र लग
तुझ ज़ुल्फ़ की जफ़ा में निपट इम्तिदाद है
5
मक़्सूद-ए-दिल है उस का ख़याल ऐ 'वली' मुझे
ज्यूँ मुझ ज़बाँ पे नाम-ए-मोहम्मद मुराद है
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