ग़ज़ल
कूचा-ए-यार ऐन कासी है
کوچۂ یار عین کاسی ہے
इस ग़ज़ल में शायर ने महबूब की गली को तीर्थ काशी के समान पावन बताते हुए अपने दिल को वहाँ का वैरागी जोगी कहा है। सूफ़ी और भारतीय आध्यात्मिक प्रतीकों के संगम से यह रचना प्रियतम के विरह और हृदय की शाश्वत उदासी को बेहद सुंदरता से उजागर करती है।
Source: rekhta · HI
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1
कूचा-ए-यार ऐन कासी है
जोगी-ए-दिल वहाँ का बासी है
2
पी के बैराग की उदासी सूँ
दिल पे मेरे सदा उदासी है
3
ऐ सनम तुझ जबीं उपर ये ख़ाल
हिंदवी हर-द्वार बासी है
4
ज़ुल्फ़ तेरी है मौज जमुना की
तिल नज़िक उस के जियूँ सनासी है
5
घर तिरा है ये रश्क-ए-देवल-ए-चीं
उस में मुद्दत सूँ दिल उपासी है
6
ये सियह-ज़ुल्फ़ तुझ ज़नख़दाँ पर
नागनी ज्यूँ कुँवे पे प्यासी है
7
तास-ए-ख़ुर्शीद ग़र्क़ है जब सूँ
बर में तेरे लिबास-ए-तासी है
8
जिस की गुफ़्तार में नहीं है मज़ा
सुख़न उस का तआ'म बासी है
9
ऐ 'वली' जो लिबास तन पे रखा
आशिक़ाँ के नज़िक लिबासी है
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