ग़ज़ल
मैं आशिक़ी में तब सूँ अफ़्साना हो रहा हूँ
میں عاشقی میں تب سوں افسانہ ہو رہا ہوں
यह दकनी ग़ज़ल इश्क़ की बेख़ुदी और महबूब के प्रति अनन्य समर्पण को बयां करती है। शायर कहता है कि महबूब की एक नज़र ने उसे पूरी दुनिया से बेगाना कर दिया है और उसकी आशिक़ी अब ज़माने में एक अफ़साना बन चुकी है।
Source: rekhta · HI
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1
मैं आशिक़ी में तब सूँ अफ़्साना हो रहा हूँ
तेरी निगह का जब सूँ दीवाना हो रहा हूँ
2
ऐ आश्ना करम सूँ यक बार आ दरस दे
तुझ बाज सब जहाँ सूँ बेगाना हो रहा हूँ
3
बाताँ लगन की मत पूछ ऐ शम-ए-बज़्म-ए-ख़ूबी
मुद्दत से तुझ झलक का परवाना हो रहा हूँ
4
शायद वो गंज-ए-ख़ूबी आवे किसी तरफ़ सूँ
इस वास्ते सरापा वीराना हो रहा हूँ
5
सौदा-ए-ज़ुल्फ़-ए-ख़ूबाँ रखता हूँ दिल में दाइम
ज़ंजीर-ए-आशिक़ी का दीवाना हो रहा हूँ
6
बरजा है गर सुनूँ नईं नासेह तिरी नसीहत
मैं जाम-ए-इश्क़ पी कर मस्ताना हो रहा हूँ
7
किस सूँ 'वली' अपस का अहवाल जा कहूँ मैं
सर-ता-क़दम मैं ग़म सूँ ग़म-ख़ाना हो रहा हूँ
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