ग़ज़ल

मुफ़्लिसी सब बहार खोती है

مفلسی سب بہار کھوتی ہے
वली दकनी· Ghazal· 5 shers· radif: खोती है

यह ग़ज़ल मुफ़लिसी की कड़वी हक़ीक़त को उजागर करती है, जो इंसान से ज़िंदगी की सारी रौनक़ और उसका आत्म-सम्मान छीन लेती है। इसके साथ ही, इसमें महबूब की दिलकश ज़ुल्फ़ों से पैदा होने वाली दिली बेचैनी और इश्क़ की तड़प को भी बयां किया गया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
मुफ़्लिसी सब बहार खोती है मर्द का ए'तिबार खोती है
2
क्यूँके हासिल हो मुज को जमइय्यत ज़ुल्फ़ तेरी क़रार खोती है
3
हर सहर शोख़ की निगह की शराब मुझ अँखाँ का ख़ुमार खोती है
4
क्यूँके मिलना सनम का तर्क करूँ दिलबरी इख़्तियार खोती है
5
ऐ 'वली' आब उस परी-रू की मुझ सिने का ग़ुबार खोती है
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मुफ़्लिसी सब बहार खोती है | Sukhan AI