ग़ज़ल
मुफ़्लिसी सब बहार खोती है
مفلسی سب بہار کھوتی ہے
यह ग़ज़ल मुफ़लिसी की कड़वी हक़ीक़त को उजागर करती है, जो इंसान से ज़िंदगी की सारी रौनक़ और उसका आत्म-सम्मान छीन लेती है। इसके साथ ही, इसमें महबूब की दिलकश ज़ुल्फ़ों से पैदा होने वाली दिली बेचैनी और इश्क़ की तड़प को भी बयां किया गया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
अभी गीत नहीं
1
मुफ़्लिसी सब बहार खोती है
मर्द का ए'तिबार खोती है
2
क्यूँके हासिल हो मुज को जमइय्यत
ज़ुल्फ़ तेरी क़रार खोती है
3
हर सहर शोख़ की निगह की शराब
मुझ अँखाँ का ख़ुमार खोती है
4
क्यूँके मिलना सनम का तर्क करूँ
दिलबरी इख़्तियार खोती है
5
ऐ 'वली' आब उस परी-रू की
मुझ सिने का ग़ुबार खोती है
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
