ग़ज़ल
ख़ूब-रू ख़ूब काम करते हैं
خوب رو خوب کام کرتے ہیں
इस ग़ज़ल में महबूब के हुस्न, दिलकश नाज़-ओ-अंदाज़ और उसकी शोख़ अदाओं की तारीफ़ की गई है। शायर बयान करता है कि ख़ूबसूरत चेहरे महज़ एक नज़र या अपनी अदा-ए-सलाम से किस तरह आशिक़ को अपना दीवाना और ग़ुलाम बना लेते हैं।
Source: rekhta · HI
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1
ख़ूब-रू ख़ूब काम करते हैं
यक निगह में ग़ुलाम करते हैं
2
देख ख़ूबाँ कूँ वक़्त मिलने के
किस अदा सूँ सलाम करते हैं
3
क्या वफ़ादार हैं कि मिलने में
दिल सूँ सब राम-राम करते हैं
4
कम-निगाही सों देखते हैं वले
काम अपना तमाम करते हैं
5
खोलते हैं जब अपनी ज़ुल्फ़ाँ कूँ
सुब्ह-ए-आशिक़ कूँ शाम करते हैं
6
साहिब-ए-लफ़्ज़ उस कूँ कह सकिए
जिस सूँ ख़ूबाँ कलाम करते हैं
7
दिल लजाते हैं ऐ 'वली' मेरा
सर्व-क़द जब ख़िराम करते हैं
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