ग़ज़ल

ख़ूब-रू ख़ूब काम करते हैं

خوب رو خوب کام کرتے ہیں
वली दकनी· Ghazal· 7 shers· radif: करते हैं

इस ग़ज़ल में महबूब के हुस्न, दिलकश नाज़-ओ-अंदाज़ और उसकी शोख़ अदाओं की तारीफ़ की गई है। शायर बयान करता है कि ख़ूबसूरत चेहरे महज़ एक नज़र या अपनी अदा-ए-सलाम से किस तरह आशिक़ को अपना दीवाना और ग़ुलाम बना लेते हैं।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
अभी गीत नहीं
लिपि व अर्थ
1
ख़ूब-रू ख़ूब काम करते हैं यक निगह में ग़ुलाम करते हैं
2
देख ख़ूबाँ कूँ वक़्त मिलने के किस अदा सूँ सलाम करते हैं
3
क्या वफ़ादार हैं कि मिलने में दिल सूँ सब राम-राम करते हैं
4
कम-निगाही सों देखते हैं वले काम अपना तमाम करते हैं
5
खोलते हैं जब अपनी ज़ुल्फ़ाँ कूँ सुब्ह-ए-आशिक़ कूँ शाम करते हैं
6
साहिब-ए-लफ़्ज़ उस कूँ कह सकिए जिस सूँ ख़ूबाँ कलाम करते हैं
7
दिल लजाते हैं ऐ 'वली' मेरा सर्व-क़द जब ख़िराम करते हैं
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.

ख़ूब-रू ख़ूब काम करते हैं | Sukhan AI