ग़ज़ल
फ़िदा-ए-दिलबर-ए-रंगीं-अदा हूँ
فدائے دلبر رنگیں ادا ہوں
इस ग़ज़ल में शायर एक दिलकश और हसीन महबूब के प्रति अपनी गहरी निष्ठा और समर्पण को व्यक्त करता है। वह यह स्पष्ट करता है कि उसका आकर्षण केवल बाह्य सुंदरता के लिए नहीं है, बल्कि उसका सच्चा जुड़ाव सिर्फ़ उन लोगों से है जो काव्य और सुखन की गहराई को समझते हैं।
Source: rekhta · HI
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1
फ़िदा-ए-दिलबर-ए-रंगीं-अदा हूँ
शहीद-ए-शाहिद-ए-गुल-गूँ-क़बा हूँ
मैं आकर्षक और नाज़-नख़रे वाले महबूब पर फ़िदा हूँ, और उस हसीन माशूक़ पर क़ुरबान हूँ जिसने गुलाब जैसे रंग का लिबास पहन रखा है।
2
हर इक मह-रू के मिलने का नहीं ज़ौक़
सुख़न के आश्ना का आश्ना हूँ
मुझे हर खूबसूरत इंसान से मिलने का कोई शौक नहीं है, मैं तो केवल शायरी की समझ रखने वाले का दोस्त हूँ।
3
किया हूँ तर्क नर्गिस का तमाशा
तलबगार-ए-निगाह-ए-बा-हया हूँ
मैंने नर्गिस के फूल का तमाशा देखना छोड़ दिया है, क्योंकि अब मुझे शर्म व हया से भरी निगाह की तलाश है।
4
न कर शमशाद की तारीफ़ मुझ पास
कि मैं उस सर्व-क़द का मुब्तला हूँ
मेरे सामने शमशाद के पेड़ की तारीफ़ मत करो, क्योंकि मैं उस सरव जैसे सीधे और सुंदर क़द वाले महबूब के प्यार में गिरफ़्तार हूँ।
5
किया मैं अर्ज़ उस ख़ुर्शीद-रू सूँ
तू शाह-ए-हुस्न मैं तेरा गदा हूँ
मैंने उस सूरज जैसे चेहरे वाले महबूब से यह अर्ज़ किया कि तू हुस्न का बादशाह है और मैं तेरा फ़क़ीर हूँ।
6
सदा रखता हूँ शौक़ उस के सुख़न का
हमेशा तिश्ना-ए-आब-ए-बक़ा हूँ
मुझे हमेशा अपने महबूब की बातें सुनने की चाह रहती है, और मैं सदा अमरता के जल (आब-ए-बक़ा) का प्यासा रहता हूँ।
7
क़दम पर उस के रखता हूँ सदा सर
'वली' हम-मशरब-ए-रंग-ए-हिना हूँ
मैं हमेशा अपने महबूब के क़दमों पर अपना सिर रखता हूँ; ऐ वली, मेरा तौर-तरीक़ा मेंहदी के रंग जैसा है जो हमेशा पैरों से लगा रहता है।
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