ग़ज़ल
आज सरसब्ज़ कोह ओ सहरा है
آج سر سبز کوہ و صحرا ہے
यह ग़ज़ल प्रकृति की हरी-भरी सुंदरता और महबूब के हुस्न-ओ-जमाल की दिलकश तारीफ़ करती है। इसमें प्राकृतिक नज़ारों के उल्लास को प्रियतम के रूप और ग्रेस के साथ जोड़कर एक मधुर और प्रेमपूर्ण वातावरण प्रस्तुत किया गया है।
Source: rekhta · HI
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1
आज सरसब्ज़ कोह ओ सहरा है
हर तरफ़ सैर है तमाशा है
आज पहाड़ और रेगिस्तान हरे-भरे हो गए हैं और हर तरफ़ घूमने-फिरने की रौनक और सुंदर नज़ारे हैं।
2
चेहरा-ए-यार ओ क़ामत-ए-ज़ेबा
गुल-ए-रंगीन ओ सर्व-ए-रअना है
महबूब का चेहरा एक रंगीन और सुंदर फूल की तरह है, और उसका आकर्षक क़द एक सुंदर व सीधे सरू के पेड़ जैसा है।
3
मअ'नी-ए-हुस्न ओ मअ'नी-ए-ख़ूबी
सूरत-ए-यार सूँ हुवैदा है
हुस्न और अच्छाई का असली अर्थ महबूब के चेहरे से साफ़ ज़ाहिर और प्रकट होता है।
4
दम-ए-जाँ-बख़्श नौ-ख़ताँ मुज कूँ
चश्मा-ए-ख़िज़्र है मसीहा है
मेरे लिए नए-नए नौजवान महबूबों की जीवन देने वाली साँस हज़रत ख़िज़्र के चश्मे और मसीहा के समान है।
5
कमर-ए-नाज़ुक ओ दहान-ए-सनम
फ़िक्र बारीक है मुअम्मा है
महबूब की नाज़ुक कमर एक बारीक विचार की तरह है और उसका छोटा मुँह एक पहेली के समान है।
6
मू-ब-मू उस कूँ है परेशानी
ज़ुल्फ़-ए-मुश्कीं का जिस कूँ सौदा है
जिसे महबूब की कस्तूरी जैसी सुगंधित ज़ुल्फ़ों का सौदा (जुनून) है, वह बाल-बाल यानी पूरी तरह से उलझन और परेशानी में रहता है।
7
क्या हक़ीक़त है तुझ तवाज़ो की
यू तलत्तुफ़ है या मुदावा है
तुम्हारी इस विनम्रता और आवभगत की असलियत क्या है? क्या यह सिर्फ़ एक मेहरबानी है या मेरे दर्द का इलाज है?
8
सबब-ए-दिलरुबाई-ए-आशिक़
मेहर है लुत्फ़ है दिलासा है
आशिक़ का दिल जीतने की असली वजह प्यार, मेहरबानी और तसल्ली या दिलासा देना है।
9
जूँ 'वली' रात दिन है मह्व-ए-ख़याल
जिस कूँ तुझ वस्ल की तमन्ना है
जिस किसी को भी तुम्हारे मिलन की चाहत है, वह 'वली' की तरह दिन-रात तुम्हारे ही ख्यालों में डूबा रहता है।
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