ग़ज़ल

अगर गुलशन तरफ़ वो नौ-ख़त-ए-रंगीं-अदा निकले

اگر گلشن طرف وو نو خط رنگیں ادا نکلے
वली दकनी· Ghazal· 7 shers· radif: निकले

इस ग़ज़ल में महबूब के मनमोहक सौंदर्य और उसके सम्मोहक प्रभाव का सुंदर चित्रण किया गया है। शायर व्यक्त करता है कि जब महबूब बाग़ की ओर निकलता है, तो प्रकृति उसका इस्तकबाल करती है और हर उदास दिल ख़ुशी से खिल उठता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
अगर गुलशन तरफ़ वो नौ-ख़त-ए-रंगीं-अदा निकले गुल ओ रैहाँ सूँ रंग-ओ-बू शिताबी पेशवा निकले
यदि वह सुंदर और नाजुक नवयुवक महबूब बाग़ की ओर निकले, तो गुलाब और तुलसी से रंग और ख़ुशबू तुरंत उसके स्वागत के लिए आगे बढ़ आएँ।
2
खिले हर ग़ुंचा-ए-दिल ज्यूँ गुल-ए-शादाब शादी सूँ अगर टुक घर सूँ बाहर वो बहार-दिल-कुशा निकले
अगर वह दिल को लुभाने वाली बहार (प्रियतम) ज़रा देर के लिए भी घर से बाहर निकले, तो हर दिल की कली खुशी से ताज़ा फूल की तरह खिल उठे।
3
ग़नीम-ए-ग़म किया है फ़ौज-बंदी इश्क़-बाज़ां पर बजा है आज वो राजा अगर नौबत बजा निकले
ग़म के दुश्मन ने प्रेमियों के ख़िलाफ़ अपनी सेना की घेराबंदी कर ली है। ऐसे में यह बिल्कुल उचित है कि वह राजा (माशूक़) भी आज शाही नगाड़ा बजाते हुए बाहर निकले।
4
निसार उस के क़दम ऊपर करूँ अंझुवाँ के गौहर सब अगर करने कूँ दिल-जूई वो सर्व-ए-ख़ुश-अदा निकले
अगर वह ख़ूबसूरत चाल वाला महबूब मेरे दिल की तसल्ली के लिए बाहर निकले, तो मैं अपने आँसुओं के सारे मोती उसके क़दमों पर न्योछावर कर दूँ।
5
सनम आए करूँगा नाला-ए-जाँ-सोज़ कूँ ज़ाहिर मगर उस संग-दिल सूँ मेहरबानी की सदा निकले
जब मेरा महबूब आएगा तो मैं अपनी जान जलाने वाली फ़रियाद उसके सामने ज़ाहिर करूँगा, शायद उस पत्थर-दिल से मेहरबानी की कोई आवाज़ निकल आए।
6
रहे मानिंद-ए-लाल-ए-बे-बहा शाहाँ के ताज ऊपर मोहब्बत में जो कुइ अस्बाब ज़ाहिर कूँ बहा निकले
जो कोई भी प्रेम में अपने सारे बाहरी साजो-सामान और धन-दौलत को बहा देता है, वह बादशाहों के ताज पर सजे अनमोल लाल (रत्न) की तरह प्रतिष्ठित रहता है।
7
बख़ीली दर्स की हरगिज़ न कीजो ऐ परी-पैकर 'वली' तेरी गली में जब कि मानिंद-ए-गदा निकले
ऐ परी जैसी सुंदर महबूब, जब भी वली तेरी गली में किसी फ़क़ीर की तरह निकले, तो उसे अपना दीदार कराने में बिल्कुल भी कंजूसी मत करना।
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