ग़ज़ल
छुपा हूँ मैं सदा-ए-बाँसुली में
چھپا ہوں میں صدائے بانسلی میں
यह ग़ज़ल प्रेम की गहन तड़प और समर्पण को व्यक्त करती है, जहाँ प्रेमी अपने अस्तित्व को बाँसुरी की धुन में समाहित कर महबूब की गली तक पहुँचने की अभिलाषा रखता है। अपनी शारीरिक लाचारी के बावजूद वह अपनी आहों और संगीत के प्रभाव से प्रियतम के सान्निध्य का अनुभव करता है।
Source: rekhta · HI
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1
छुपा हूँ मैं सदा-ए-बाँसुली में
कि ता जाऊँ परी-रू की गली में
मैं बाँसुरी की आवाज़ में छुपा हुआ हूँ ताकि अपने परी जैसे चेहरे वाले महबूब की गली में पहुँच सकूँ।
2
न थी ताक़त मुझे आने की लेकिन
ब-ज़ोर-ए-आह पहुँचा तुझ गली में
मुझमें यहाँ आने की शारीरिक शक्ति नहीं थी, लेकिन अपनी गहरी आहों के सहारे और ज़ोर पर मैं तुम्हारी गली तक पहुँच गया।
3
अयाँ है रंग की शोख़ी सूँ ऐ शोख़
बदन तेरा क़बा-ए-संदली में
ऐ शोख़, तेरे रंग की चमक और शोख़ी के कारण चंदन के रंग वाले लिबास में भी तेरा बदन साफ़ नज़र आ रहा है।
4
जो है तेरे दहन में रंग ओ ख़ूबी
कहाँ ये रंग ये ख़ूबी कली में
जो रंग और सुंदरता तुम्हारे मुख (होंठों) में है, वह रंग और ख़ूबी किसी कली में कहाँ मिल सकती है।
5
किया जियूँ लफ़्ज़ में मअ'नी सिरीजन
मक़ाम अपना दिल-ओ-जान-ए-'वली' में
हे प्रिय, जिस प्रकार किसी शब्द में उसका अर्थ समाया रहता है, उसी प्रकार तुमने वली के दिल और जान में अपना ठिकाना बना लिया है।
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