ग़ज़ल
मत ग़ुस्से के शो'ले सूँ जलते कूँ जलाती जा
مت غصہ کے شعلے سوں جلتے کوں جلاتی جا
यह ग़ज़ल प्रेम, विरह और मनुहार के भावों से ओत-प्रोत है। इसमें आशिक़ अपनी नटखट और गर्वीली महबूबा से गुज़ारिश करता है कि वह ग़ुस्से की आग भड़काने के बजाय मेहरबानी और मुहब्बत का इज़हार करे।
Source: rekhta · HI
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1
मत ग़ुस्से के शो'ले सूँ जलते कूँ जलाती जा
टुक मेहर के पानी सूँ तू आग बुझाती जा
2
तुझ चाल की क़ीमत सूँ दिल नीं है मिरा वाक़िफ़
ऐ मान भरी चंचल टुक भाव बताती जा
3
इस रात अँधारी में मत भूल पड़ूँ तुझ सूँ
टुक पाँव के झाँझर की झंकार सुनाती जा
4
मुझ दिल के कबूतर कूँ बाँधा है तिरी लट ने
ये काम धरम का है टुक उस को छुड़ाती जा
5
तुझ मुख की परस्तिश में गई उम्र मिरी सारी
ऐ बुत की पुजनहारी टुक उस को पुजाती जा
6
तुझ इश्क़ में जल जल कर सब तन कूँ किया काजल
ये रौशनी अफ़ज़ा है अँखिया को लगाती जा
7
तुझ नेह में दिल जल जल जोगी की लिया सूरत
यक बार उसे मोहन छाती सूँ लगाती जा
8
तुझ घर की तरफ़ सुंदर आता है 'वली' दाएम
मुश्ताक़ दरस का है टुक दर्स दिखाती जा
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