ग़ज़ल
हुआ ज़ाहिर ख़त-ए-रू-ए-निगार आहिस्ता-आहिस्ता
ہوا ظاہر خط روئے نگار آہستہ آہستہ
यह ग़ज़ल महबूब के चेहरे पर यौवन के मंद-मंद निखार और प्रेम में धैर्य के महत्व को दर्शाती है, जिसकी तुलना उपवन में बहार के आहिस्ता आगमन से की गई है। कवि अत्यंत नफ़ासत के साथ महबूब की चंचल और वहशी निगाहों को सब्र के साथ धीरे-धीरे वश में करने की दास्तान बयां करता है।
Source: rekhta · HI
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1
हुआ ज़ाहिर ख़त-ए-रू-ए-निगार आहिस्ता-आहिस्ता
कि ज्यूँ गुलशन में आती है बहार आहिस्ता-आहिस्ता
महबूब के चेहरे पर हल्के बाल (ख़त) धीरे-धीरे इस तरह दिखने लगे, जैसे बाग़ में बहार आहिस्ता-आहिस्ता आती है।
2
किया हूँ रफ़्ता रफ़्ता राम उस की चश्म-ए-वहशी कूँ
कि ज्यूँ आहू कूँ करते हैं शिकार आहिस्ता-आहिस्ता
मैंने धीरे-धीरे उसकी चंचल और वहशी आँखों को अपने वश में कर लिया है, ठीक वैसे ही जैसे किसी हिरन का आहिस्ता-आहिस्ता शिकार किया जाता है।
3
जो अपने तन कूँ मिस्ल-ए-जूएबार अव्वल किया पानी
हुआ उस सर्व-क़द सूँ हम-कनार आहिस्ता-आहिस्ता
जिसने पहले अपने शरीर को बहती नदी की तरह पानी बना दिया, वह धीरे-धीरे उस सर्व जैसे लंबे क़द वाले महबूब के आलिंगन में आ गया।
4
बरंग-ए-क़तरा-ए-सीमाब मेरे दिल की जुम्बिश सूँ
हुआ है दिल सनम का बे-क़रार आहिस्ता-आहिस्ता
पारे की बूँद की तरह मेरे दिल की धड़कन और हलचल के असर से, मेरे महबूब का दिल भी धीरे-धीरे बेचैन हो गया है।
5
उसे कहना बजा है इश्क़ के गुलज़ार का बुलबुल
जो गुल-रूयाँ में पाया ए'तिबार आहिस्ता-आहिस्ता
उसे प्रेम के बाग़ का बुलबुल कहना बिल्कुल सही है, जिसने आहिस्ता-आहिस्ता फूल जैसे हसीन चेहरों वालों का भरोसा हासिल कर लिया।
6
मिरा दिल अश्क हो पहुँचा है कूचे में सिरीजन के
गया काबे में ये कश्ती-सवार आहिस्ता-आहिस्ता
मेरा दिल आँसू बनकर महबूब की गली में पहुँच गया है, मानो कोई कश्ती-सवार धीरे-धीरे काबे में दाख़िल हो गया हो।
7
'वली' मत हासिदाँ की बात सूँ दिल कूँ मुकद्दर कर
कि आख़िर दिल सूँ जावेगा ग़ुबार आहिस्ता-आहिस्ता
ऐ वली, ईर्ष्या करने वालों की बातों से अपने दिल को उदास या मैला मत करो, क्योंकि आखिरकार दिल से यह मलाल और ग़ुबार धीरे-धीरे दूर हो जाएगा।
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