ग़ज़ल

दिल को दर्द-आश्ना किया तू ने

دل کو درد آشنا کیا تو نے
अल्ताफ़ हुसैन हाली· Ghazal· 20 shers· radif: किया तू ने

यह ग़ज़ल ईश्वर अथवा महबूब के प्रति असीम कृतज्ञता और प्रेम की भावना को प्रकट करती है, जिसने दिल को दर्द से परिचित कराकर उसी दर्द को शफ़ा बना दिया। इसमें यह भाव दर्शाया गया है कि ईश्वरीय कृपा ने ख़ाक के पुतले यानी इंसान को वफ़ा और मोहब्बत से नवाज़कर कीमिया बना दिया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
दिल को दर्द-आश्ना किया तू ने दर्द-ए-दिल को दवा किया तू ने
तुमने मेरे दिल को दर्द से परिचित कराया और फिर दिल के उसी दर्द को दवा बना दिया।
2
तब-ए-इंसाँ को दी सिरिश्त-ए-वफ़ा ख़ाक को कीमिया किया तू ने
तूने इंसान के स्वभाव को वफ़ा की फ़ितरत बख़्शी और इस तरह महज़ मिट्टी को सोना बना दिया।
3
वस्ल-ए-जानाँ मुहाल ठहराया क़त्ल-ए-आशिक़ रवा किया तू ने
तूने महबूब से मिलन को तो नामुमकिन ठहरा दिया, लेकिन आशिक़ की जान लेना जायज़ कर दिया।
4
था न जुज़ ग़म बिसात-ए-आशिक़ में ग़म को राहत-फ़ज़ा किया तू ने
आशिक़ की हैसियत या पूँजी में ग़म के सिवा कुछ न था, मगर तूने उसी ग़म को भी चैन और राहत पहुँचाने वाला बना दिया।
5
जान थी इक वबाल फ़ुर्क़त में शौक़ को जाँ-गुज़ा किया तू ने
जुदाई में ज़िंदगी पहले ही एक भारी मुसीबत बनी हुई थी, और तुमने मेरी तड़प को और भी जानलेवा बना दिया।
6
थी मोहब्बत में नंग मिन्नत-ए-ग़ैर जज़्ब-ए-दिल को रसा किया तू ने
इश्क़ में किसी ग़ैर की मिन्नतें करना मेरे लिए अपमान की बात थी, लेकिन तूने मेरे दिल के आकर्षण (तड़प) को इतना असरदार बना दिया कि वह सीधे तुझ तक पहुँच सका।
7
राह ज़ाहिद को जब कहीं न मिली दर-ए-मय-ख़ाना वा किया तू ने
जब ज़ाहिद (संन्यासी) को कहीं कोई राह न मिली, तब तूने उसके लिए मयख़ाने का दरवाज़ा खोल दिया।
8
क़त्अ होने ही जब लगा पैवंद ग़ैर को आश्ना किया तू ने
जैसे ही हमारा रिश्ता टूटने के क़रीब पहुँचा, तुमने किसी पराए को अपना क़रीबी बना लिया।
9
थी जहाँ कारवाँ को देनी राह इश्क़ को रहनुमा किया तू ने
जहाँ कारवाँ को रास्ता दिखाना था, वहाँ तुमने इश्क़ को उसका मार्गदर्शक बना दिया।
10
नाव भर कर जहाँ डुबोनी थी अक़्ल को नाख़ुदा किया तू ने
जहाँ भरी हुई नाव को डुबो देना था, वहाँ तुमने अक़्ल (बुद्धि) को कश्ती का मल्लाह बना दिया।
11
बढ़ गई जब पिदर को मेहर-ए-पिसर उस को उस से जुदा किया तू ने
जब पिता के दिल में बेटे के लिए प्यार बहुत बढ़ गया, तब तूने उन दोनों को एक-दूसरे से अलग कर दिया।
12
जब हुआ मुल्क ओ माल रहज़न-ए-होश बादशह को गदा किया तू ने
जब सल्तनत और दौलत ने होश-ओ-हवास छीन लिए, तो तूने उस बादशाह को भी भिखारी बना दिया।
13
जब मिली काम-ए-जाँ को लज़्ज़त-ए-दर्द दर्द को बे-दवा किया तू ने
जैसे ही मेरी जान को दर्द का स्वाद मिलने लगा, वैसे ही तूने उस दर्द को लाइलाज बना दिया।
14
जब दिया राह-रौ को ज़ौक़-ए-तलब सई को ना-रसा किया तू ने
जब तूने मुसाफ़िर को तलाश का शौक़ दिया, तब तूने ही उसकी कोशिश को मंज़िल तक न पहुँचने वाला बना दिया।
15
पर्दा-ए-चश्म थे हिजाब बहुत हुस्न को ख़ुद-नुमा किया तू ने
आँखों के आगे पहले ही कई परदे और रुकावटें थीं, फिर भी तूने हुस्न को ख़ुद को ज़ाहिर करने वाला बना दिया।
16
इश्क़ को ताब-ए-इंतिज़ार न थी ग़ुर्फ़ा इक दिल में वा किया तू ने
इश्क़ में इंतज़ार की ताब (धैर्य) नहीं थी, इसलिए तुमने दिल के भीतर एक खिड़की खोल दी।
17
हरम आबाद और दैर ख़राब जो किया सब बजा किया तू ने
तूने हरम को आबाद रखा और मंदिर को वीरान कर दिया; तूने जो भी किया, बिल्कुल ठीक और उचित किया।
18
सख़्त अफ़्सुर्दा तब्अ' थी अहबाब हम को जादू नवा किया तू ने
हे दोस्तों, मेरा स्वभाव बहुत उदास और मायूस था, लेकिन तुमने मुझे जादुई स्वर में गाने वाला बना दिया।
19
फिर जो देखा तो कुछ न था या रब कौन पूछे कि क्या किया तू ने
हे ईश्वर, जब मैंने दोबारा देखा तो वहाँ कुछ भी नहीं बचा था; अब भला तुमसे यह पूछने वाला कौन बचा है कि तुमने यह क्या कर दिया।
20
'हाली' उट्ठा हिला के महफ़िल को आख़िर अपना कहा किया तू ने
ऐ हाली, तू पूरी महफ़िल को झकझोर कर उठ खड़ा हुआ; आखिरकार तूने वही कर दिखाया जो तूने कहा था।
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