था न जुज़ ग़म बिसात-ए-आशिक़ में ग़म को राहत-फ़ज़ा किया तू ने

“There was naught save sorrow in the lover's meager store; yet that very grief you turned to solace evermore.”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

आशिक़ की हैसियत या पूँजी में ग़म के सिवा कुछ न था, मगर तूने उसी ग़म को भी चैन और राहत पहुँचाने वाला बना दिया।

विस्तार

आशिक़ की कुल बिसात यानी उसकी जमा-पूँजी सिर्फ़ दर्द और रंज ही थी, उसके पास इसके सिवा कुछ न था। मगर महबूब का करम तो देखिए कि उसने उसी तड़प को दिल का सबसे बड़ा चैन और सुकून बना दिया। इश्क़ का यह ख़ूबसूरत फलसफ़ा बताता है कि जब महबूब का तसव्वुर साथ हो, तो जुदाई का ग़म भी ज़िंदगी की सबसे मीठी राहत बन जाता है।

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