غزل

دیکھ کر جوبن ترا کس کس کو حیرانی ہوئی

دیکھ کر جوبن ترا کس کس کو حیرانی ہوئی
داغ دہلوی· Ghazal· 21 shers· radif: हुई

یہ غزل محبوب کے بے مثال حسن اور شباب کے سحر انگیز جلووں کا بیان کرتی ہے جس نے ہر دیکھنے والے کو حیرت زدہ کر دیا ہے۔ اس میں پردۂ راز میں پلنے والے عشق کی جان لیوا تڑپ اور پوشیدہ جذبات کی کشمکش کو درد مندی کے ساتھ پیش کیا گیا ہے۔

Source: rekhta · HI

نغمہ سنیں
ابھی نغمہ نہیں
رسم الخط
1
देख कर जोबन तिरा किस किस को हैरानी हुई इस जवानी पर जवानी आप दीवानी हुई
دیکھ کر جوبن ترا کس کس کو حیرانی ہوئی اس جوانی پر جوانی آپ دیوانی ہوئی
2
पर्दे पर्दे में मोहब्बत दुश्मन-ए-जानी हुई ये ख़ुदा की मार क्या ऐ शौक़-ए-पिन्हानी हुई
پردے پردے میں محبت دشمن جانی ہوئی یہ خدا کی مار کیا اے شوق پنہانی ہوئی
3
दिल का सौदा कर के उन से क्या पशेमानी हुई क़द्र उस की फिर कहाँ जिस शय की अर्ज़ानी हुई
دل کا سودا کر کے ان سے کیا پشیمانی ہوئی قدر اس کی پھر کہاں جس شے کی ارزانی ہوئی
4
मेरे घर उस शोख़ की दो दिन से मेहमानी हुई बेकसी की आज कल क्या ख़ाना-वीरानी हुई
میرے گھر اس شوخ کی دو دن سے مہمانی ہوئی بیکسی کی آج کل کیا خانہ ویرانی ہوئی
5
तर्क-ए-रस्म-ओ-राह पर अफ़्सोस है दोनों तरफ़ हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई
ترک رسم و راہ پر افسوس ہے دونوں طرف ہم سے نادانی ہوئی یا تم سے نادانی ہوئی
6
इब्तिदा से इंतिहा तक हाल उन से कह तो दूँ फ़िक्र ये है और जो कह कर पशेमानी हुई
ابتدا سے انتہا تک حال ان سے کہہ تو دوں فکر یہ ہے اور جو کہہ کر پشیمانی ہوئی
7
ग़म क़यामत का नहीं वाइ'ज़ मुझे ये फ़िक्र है दीन कब बाक़ी रहा दुनिया अगर फ़ानी हुई
غم قیامت کا نہیں واعظ مجھے یہ فکر ہے دین کب باقی رہا دنیا اگر فانی ہوئی
8
तुम न शब को आओगे ये है यक़ीं आया हुआ तुम न मानोगे मिरी ये बात है मानी हुई
تم نہ شب کو آؤ گے یہ ہے یقیں آیا ہوا تم نہ مانو گے مری یہ بات ہے مانی ہوئی
9
मुझ में दम जब तक रहा मुश्किल में थे तीमारदार मेरी आसानी से सब यारों की आसानी हुई
مجھ میں دم جب تک رہا مشکل میں تھے تیماردار میری آسانی سے سب یاروں کی آسانی ہوئی
10
इस को क्या कहते हैं उतना ही बढ़ा शौक़-ए-विसाल जिस क़दर मशहूर उन की पाक-दामानी हुई
اس کو کیا کہتے ہیں اتنا ہی بڑھا شوق وصال جس قدر مشہور ان کی پاک دامانی ہوئی
11
बज़्म से उठने की ग़ैरत बैठने से दिल को रश्क देख कर ग़ैरों का मजमा क्या परेशानी हुई
بزم سے اٹھنے کی غیرت بیٹھنے سے دل کو رشک دیکھ کر غیروں کا مجمع کیا پریشانی ہوئی
12
दावा-ए-तस्ख़ीर पर ये उस परी-वश ने कहा आप का दिल क्या हुआ मोहर-ए-सुलेमानी हुई
دعویٰ تسخیر پر یہ اس پری وش نے کہا آپ کا دل کیا ہوا مہر سلیمانی ہوئی
13
खुल गईं ज़ुल्फ़ें मगर उस शोख़ मस्त-ए-नाज़ की झूमती बाद-ए-सबा फिरती है मस्तानी हुई
کھل گئیں زلفیں مگر اس شوخ مست ناز کی جھومتی باد صبا پھرتی ہے مستانی ہوئی
14
मैं सरापा सज्दे करता उस के दर पर शौक़ से सर से पा तक क्यूँ न पेशानी ही पेशानी हुई
میں سراپا سجدے کرتا اس کے در پر شوق سے سر سے پا تک کیوں نہ پیشانی ہی پیشانی ہوئی
15
दिल की क़ल्ब-ए-माहियत का हो उसे क्यूँकर यक़ीं कब हवा मिट्टी हुई है आग कब पानी हुई
دل کی قلب ماہیت کا ہو اسے کیونکر یقیں کب ہوا مٹی ہوئی ہے آگ کب پانی ہوئی
16
आते ही कहते हो अब घर जाएँगे अच्छी कही ये मसल पूरी यहाँ मन-मानी घर जानी हुई
آتے ہی کہتے ہو اب گھر جائیں گے اچھی کہی یہ مثل پوری یہاں من مانی گھر جانی ہوئی
17
अरसा-ए-महशर में तुझ को ढूँड लाऊँ तो सही कोई छुप सकती है जो सूरत हो पहचानी हुई
عرصۂ محشر میں تجھ کو ڈھونڈ لاؤں تو سہی کوئی چھپ سکتی ہے جو صورت ہو پہچانی ہوئی
18
देख कर क़ातिल का ख़ाली हाथ भी जी डर गया उस की चीन-ए-आस्तीं भी चीन-ए-पेशानी हुई
دیکھ کر قاتل کا خالی ہاتھ بھی جی ڈر گیا اس کی چین آستیں بھی چین پیشانی ہوئی
19
खा के धोका उस बुत-ए-कमसिन ने दामन में लिए अश्क-अफ़्शानी भी मेरी गौहर-अफ़्शानी हुई
کھا کے دھوکا اس بت کمسن نے دامن میں لیے اشک افشانی بھی میری گوہر افشانی ہوئی
20
बेकसी पर मेरी अपनी तेग़ की हसरत तो देख चश्म-ए-जौहर भी ब-शक्ल-ए-चश्म-ए-हैरानी हुई
بیکسی پر میری اپنی تیغ کی حسرت تو دیکھ چشم جوہر بھی بشکل چشم حیرانی ہوئی
21
बेकसी पर 'दाग़' की अफ़्सोस आता है हमें किस जगह किस वक़्त उस की ख़ाना-वीरानी हुई
بیکسی پر داغؔ کی افسوس آتا ہے ہمیں کس جگہ کس وقت اس کی خانہ ویرانی ہوئی
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