ग़ज़ल

उज़्र उन की ज़बान से निकला

عذر ان کی زبان سے نکلا
दाग़ देहलवी· Ghazal· 26 shers· radif: से निकला

यह ग़ज़ल महबूब के बहानों और उसकी बेरुख़ी के तीखे प्रहार को बयां करती है, जो आशिक़ के दिल पर कमान से निकले तीर की तरह असर करते हैं। इसमें महबूब की दिलकश मगर छलने वाली अदाओं और आशिक़ की तड़प व बेबसी का भावपूर्ण चित्रण है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
उज़्र उन की ज़बान से निकला तीर गोया कमान से निकला
उनकी ज़बान से बहाना इस तरह निकला, मानो कमान से कोई तीर छूटा हो।
2
वो छलावा इस आन से निकला अल-अमाँ हर ज़बान से निकला
वह छलावा ऐसी शान-ओ-शौकत से सामने आया कि हर किसी की ज़बान से पनाह माँगने की पुकार (अल-अमाँ) निकल पड़ी।
3
ख़ार-ए-हसरत बयान से निकला दिल का काँटा ज़बान से निकला
हसरत और अधूरी ख्वाहिशों का काँटा बयान करने से निकल गया, और दिल में चुभा हुआ काँटा ज़ुबान के ज़रिए बाहर आ गया।
4
फ़ित्ना-गर क्या मकान से निकला आसमाँ आसमान से निकला
जैसे ही वह उपद्रव मचाने वाला अपने घर से बाहर निकला, ऐसा लगा मानो आसमान के अंदर से ही एक और आसमान निकल आया हो।
5
आ गया ग़श निगाह देखते ही मुद्दआ कब ज़बान से निकला
उनकी नज़र देखते ही मुझ पर बेहोशी छा गई, ऐसे में दिल की बात भला ज़ुबान से कब निकल पाती।
6
खा गए थे वफ़ा का धोका हम झूट सच इम्तिहान से निकला
हम वफ़ादारी के धोखे में आ गए थे, लेकिन क्या झूठ था और क्या सच, यह तो इम्तिहान (आज़माइश) के बाद ही सामने आया।
7
दिल में रहने न दूँ तिरा शिकवा दिल में आया ज़बान से निकला
मैं तुम्हारे ख़िलाफ़ कोई शिकवा अपने दिल में नहीं रहने दूँगा; जैसे ही वह दिल में आता है, तुरंत ज़बान से निकल जाता है।
8
वहम आते हैं देखिए क्या हो वो अकेला मकान से निकला
मन में कई तरह की आशंकाएं और वहम आ रहे हैं कि न जाने क्या होगा, क्योंकि वह घर से बिल्कुल अकेला निकला है।
9
तुम बरसते रहे सर-ए-महफ़िल कुछ भी मेरी ज़बान से निकला
क्या मेरी ज़बान से ऐसा कुछ निकला भी था जो तुम भरी महफ़िल में मुझ पर लगातार बरसते रहे?
10
सच तो ये है मोआमला दिल का बाहर अपने गुमान से निकला
सच तो यह है कि दिल का मामला मेरी सोच और अंदाज़े से कहीं बाहर निकला।
11
उस को आयत हदीस क्या समझें जो तुम्हारी ज़बान से निकला
तुम्हारी ज़बान से जो बात निकली है, उसे हम केवल कोई आयत या हदीस ही क्यों समझें?
12
पड़ गया जो ज़बाँ से तेरी हर्फ़ फिर न अपने मकान से निकला
तुम्हारी ज़बान से जो इल्ज़ाम या बात निकल गई, उसके बाद वह शख्स फिर कभी अपने घर से बाहर नहीं निकला।
13
देख कर रू-ए-यार सल्ले-अला बे-तहाशा ज़बान से निकला
महबूब का चेहरा देखकर मेरी ज़बान से अनायास ही प्रशंसा में 'सल्ले-अला' निकल पड़ा।
14
लो क़यामत अब आई वो काफ़िर बन-बना कर मकान से निकला
देखो, अब क़यामत आ ही गई क्योंकि वह काफ़िर महबूब खूब सज-संवर कर घर से बाहर निकला है।
15
मर गए हम मगर तिरा अरमान दिल से निकला न जान से निकला
हम मर गए लेकिन तुम्हारी चाहत और अरमान न तो हमारे दिल से निकले और न ही जान से अलग हुए।
16
रहरव-ए-राह-ए-इश्क़ थे लाखों आगे मैं कारवान से निकला
इश्क़ की राह पर चलने वाले लाखों मुसाफ़िर थे, लेकिन मैं उस पूरे कारवाँ से आगे निकल गया।
17
समझो पत्थर की तुम लकीर उसे जो हमारी ज़बान से निकला
जो कुछ भी हमारी ज़बान से निकला है, उसे पत्थर की लकीर यानी पूरी तरह अटल और पक्का समझो।
18
बज़्म से तुम को ले के जाएँगे काम कब फूल-पान से निकला
हम आपको इस महफ़िल से अपने साथ लेकर ही जाएँगे, क्योंकि सिर्फ़ फूल और पान पेश करने से कभी काम नहीं बनता।
19
क्या मुरव्वत है नावक-ए-दिल-दोज़ पहले हरगिज़ न जान से निकला
दिल को भेदने वाले तीर की भी क्या मुरव्वत है कि वह जान निकलने से पहले कभी शरीर से बाहर नहीं निकला।
20
तेरे दीवानों का भी लश्कर आज किस तजम्मुल से शान से निकला
आज तुम्हारे दीवानों का लश्कर कितनी भव्यता और शान-ओ-शौकत के साथ बाहर निकला है।
21
मुड़ के देखा तो मैं ने कब देखा दूर जब पासबान से निकला
मैंने पीछे मुड़कर सिर्फ़ तब देखा जब मैं पहरेदार से बहुत दूर निकल आया था।
22
वो हिले लब तुम्हारे वादे पर वो तुम्हारी ज़बान से निकला
वादे की बात पर तुम्हारे होंठ हिले और वह बात तुम्हारी ज़बान से निकल गई।
23
उस की बाँकी अदा ने जब मारा दम मिरा आन तान से निकला
जब उसकी बाँकी अदा ने मुझे मारा, तब मेरे प्राण पूरी शान और ठाठ-बाट से निकले।
24
मेरे आँसू की उस ने की तारीफ़ ख़ूब मोती ये कान से निकला
उसने मेरे आँसू की तारीफ़ करते हुए कहा कि इस ख़ान (या कान) से कितना उम्दा मोती निकला है।
25
हम खड़े तुम से बातें करते थे ग़ैर क्यूँ दरमियान से निकला
हम खड़े होकर आपसे बातें कर रहे थे, फिर यह पराया व्यक्ति हमारे बीच में क्यों आ गया?
26
ज़िक्र अहल-ए-वफ़ा का जब आया 'दाग़' उन की ज़बान से निकला
जब भी वफ़ादारों का ज़िक्र आया, तब उनकी ज़ुबान से 'दाग़' का ही नाम निकला।
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