दाग़ देहलवी
दाग़ का कलाम चार प्रमुख दीवानों में संकलित है: 'गुलज़ार-ए-दाग़', 'आफ़्ताब-ए-दाग़', 'माहताब-ए-दाग़' और 'यादगार-ए-दाग़'। उनकी मशहूर ग़ज़लों में 'आप का ए'तिबार कौन करे' और 'अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता' शामिल हैं। उन्होंने 'फ़रियाद-ए-दाग़' नामक मसनवी भी रची।
लाल क़िले के माहौल में पले-बढ़े दाग़ ने उस्ताद ज़ौक़ से शायरी सीखी और दिल्ली की मुहावरेदार ज़बान को अपनी पहचान बनाया। उनकी शायरी में दार्शनिक उलझनों के बजाय हुस्न-ओ-इश्क़ की शोख़ी, साफ़गोई और ज़बान की नफ़ासत नुमायाँ है।
हैदराबाद के निज़ाम मीर महबूब अली ख़ान के उस्ताद बनने पर उन्हें 'फ़सीह-उल-मुल्क' और 'नवाब निज़ाम यार जंग' जैसे प्रतिष्ठित ख़िताबों से नवाज़ा गया।
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