ग़ज़ल

तुम आईना ही न हर बार देखते जाओ

تم آئینہ ہی نہ ہر بار دیکھتے جاؤ
दाग़ देहलवी· Ghazal· 20 shers· radif: देखते जाओ

इस ग़ज़ल में प्रेमी अपने महबूब से ख़ुद को आईने में निहारने के बजाय अपने तड़पते दिल की ओर देखने की भावुक गुज़ारिश करता है। वह बेबसी और मिन्नत के साथ अपने दिल-ए-ज़ार की हालत पर एक नज़र डालने की फ़रियाद करता है। यह कलाम इश्क़ की चाहत, विरह और गहरे दर्द का एक ख़ूबसूरत इज़हार है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
तुम आईना ही न हर बार देखते जाओ मिरी तरफ़ भी तो सरकार देखते जाओ
आप हर बार सिर्फ़ आईने में ही मत देखते रहिए, कभी मेरी तरफ़ भी तो देख लीजिए सरकार।
2
न जाओ हाल-ए-दिल-ए-ज़ार देखते जाओ कि जी न चाहे तो नाचार देखते जाओ
अभी मत जाओ, कम से कम मेरे दुखी दिल का हाल तो देखते जाओ; अगर तुम्हारा मन न भी करे, तो मजबूरी में ही सही पर इसे देखते हुए जाओ।
3
बहार-ए-उम्र में बाग़-ए-जहाँ की सैर करो खिला हुआ है ये गुलज़ार देखते जाओ
अपनी जवानी के दिनों में इस दुनिया रूपी बाग़ की सैर कर लो। यह चमन पूरी तरह खिला हुआ है, इसलिए आगे बढ़ते हुए इसका नज़ारा देखते जाओ।
4
यही तो चश्म-ए-हक़ीक़त निगर का सुर्मा है निज़ा-ए-काफ़िर-ओ-दीं-दार देखते जाओ
सच्चाई को देखने वाली आँख के लिए यही तो सुर्मा है, बस तुम काफ़िर और धर्मनिष्ठ के बीच के झगड़े को देखते रहो।
5
उठाओ आँख न शरमाओ ये तो महफ़िल है ग़ज़ब से जानिब-ए-अग़्यार देखते जाओ
अपनी आँखें उठाइए और संकोच मत कीजिए क्योंकि यह तो महफ़िल है; बस ग़ैरों यानी प्रतिद्वंद्वियों की तरफ़ ग़ुस्से से देखते रहिए।
6
नहीं है जिंस-ए-वफ़ा की तुम्हें जो क़द्र न हो बनेंगे कितने ख़रीदार देखते जाओ
अगर तुम्हें वफ़ा की कोई क़द्र नहीं है तो न सही, बस देखते जाओ कि इस वफ़ा के कितने ख़रीदार सामने आते हैं।
7
तुम्हें ग़रज़ जो करो रहम पाएमालों पर तुम अपनी शोख़ी-ए-रफ़्तार देखते जाओ
तुम्हें अपने कदमों तले कुचले हुए लोगों पर दया करने की क्या ज़रूरत है, तुम तो बस अपनी चंचल चाल की अदा देखते रहो।
8
क़सम भी खाई थी क़ुरआन भी उठाया था फिर आज है वही इंकार देखते जाओ
क़सम भी खाई गई थी और क़ुरआन भी उठाया गया था, लेकिन आज फिर वही इनकार दोहराया जा रहा है; बस देखते जाइए।
9
ये शामत आई कि उस की गली में दिल ने कहा खुला है रौज़न-ए-दीवार देखते जाओ
मेरी यह शामत आई कि महबूब की गली से गुज़रते हुए दिल ने कहा कि दीवार का झरोखा खुला है, जाते-जाते अंदर देखते जाओ।
10
हुआ है क्या अभी हंगामा और कुछ होगा फ़ुग़ाँ में हश्र के आसार देखते जाओ
अभी तो कुछ हुआ ही नहीं है, आगे चलकर और बड़ा हंगामा होगा; बस मेरी आह-ओ-फ़रियाद में क़यामत के लक्षण देखते जाइए।
11
शब-ए-विसाल अदू की यही निशानी है निशाँ-ए-बोसा-ए-रुख़्सार देखते जाओ
दुश्मन के साथ मिलन की रात की यही निशानी है, जाते हुए अपने गाल पर उस चुंबन का निशान देखते जाओ।
12
तुम्हारी आँख मिरे दिल से ले सबब बे-वज्ह हुई है लड़ने को तय्यार देखते जाओ
बिना किसी वजह के तुम्हारी आँखें कोई बहाना ढूँढ़कर मेरे दिल से उलझने या लड़ने को तैयार हो गई हैं, बस अब आगे देखते जाइए।
13
इधर को आ ही गए अब तो हज़रत-ए-ज़ाहिद यहीं है ख़ाना-ए-ख़ु़म्मार देखते जाओ
ऐ ज़ाहिद, अब जब आप इस तरफ़ आ ही गए हैं, तो यहीं मयख़ाना भी है, उसे भी देखते जाइए।
14
रक़ीब बरसर-ए-परख़ाश हम से होता है बढ़ेगी मुफ़्त में तकरार देखते जाओ
रक़ीब हमसे झगड़ा करने पर आमादा है, और देखते ही देखते यह बेवजह का विवाद और बढ़ जाएगा।
15
नहीं हैं जुर्म-ए-मोहब्बत में सब के सब मुल्ज़िम ख़ता मुआ'फ़ ख़ता-वार देखते जाओ
मोहब्बत के जुर्म में हर कोई मुल्ज़िम नहीं होता; बस ख़ता माफ़ कीजिए और इस गुनहगार को देखते रहिए।
16
दिखा रही है तमाशा फ़लक की नैरंगी नया है शो'बदा हर बार देखते जाओ
आसमान (किस्मत) के बदलते रंग एक तमाशा दिखा रहे हैं; हर बार एक नया करतब सामने आता है, बस देखते जाइए।
17
बना दिया मिरी चाहत ने ग़ैरत-ए-यूसुफ़ तुम अपनी गर्मी-ए-बाज़ार देखते जाओ
मेरी चाहत ने तुम्हें इतना हसीन बना दिया है कि हज़रत यूसुफ़ को भी रश्क हो, अब तुम बस अपने हुस्न की मांग और बाज़ार की रौनक देखते जाओ।
18
न जाओ बंद किए आँख रह-रवान-ए-अदम इधर उधर भी ख़बर-दार देखते जाओ
ऐ मृत्यु (परलोक) की ओर जाने वाले मुसाफ़िरों, अपनी आँखें बंद करके मत जाओ; सावधान रहो और आगे बढ़ते हुए अपने आस-पास भी देखते जाओ।
19
सुनी-सुनाई पे हरगिज़ कभी अमल न करो हमारे हाल के अख़बार देखते जाओ
सुनी-सुनाई बातों पर कभी भी अमल मत करो, बल्कि मेरी हालत की ख़बरों को खुद देखते रहो।
20
कोई न कोई हर इक शेर में है बात ज़रूर जनाब-ए-'दाग़' के अशआ'र देखते जाओ
जनाब 'दाग़' के शेरों को पढ़ते जाइए, उनके हर एक शेर में कोई न कोई ख़ास बात ज़रूर होती है।
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