उठाओ आँख न शरमाओ ये तो महफ़िल है — दाग़ देहलवी

उठाओ आँख न शरमाओ ये तो महफ़िल है ग़ज़ब से जानिब-ए-अग़्यार देखते जाओ

“Raise your eyes, be not shy, for this is a gathering; keep casting glances of wrath upon the rivals.”

— दाग़ देहलवी

अर्थ

अपनी आँखें उठाइए और संकोच मत कीजिए क्योंकि यह तो महफ़िल है; बस ग़ैरों यानी प्रतिद्वंद्वियों की तरफ़ ग़ुस्से से देखते रहिए।

विस्तार

इस ख़ूबसूरत शेर में शायर अपनी महबूबा से बड़ी नज़ाकत और शरारत से कह रहा है कि महफ़िल में यूँ आँखें झुकाकर शर्माने की ज़रूरत नहीं है। वह चाहता है कि माशूक़ पूरे हक़ और बेबाकी से नज़रें उठाए और रक़ीबों यानी दूसरों को ग़ुस्से भरी नज़रों से देखकर उनकी हद याद दिला दे। यहाँ ग़ैरों के लिए महबूबा का यह ग़ज़ब और तल्ख़ अंदाज़ दरअसल शायर के लिए उसकी बेपनाह वफ़ादारी और मुहब्बत का ही एक दिलकश इज़हार है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.