ग़ज़ल

अगर न ज़ोहरा-जबीनों के दरमियाँ गुज़रे

اگر نہ زہرہ جبینوں کے درمیاں گزرے
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 23 shers· radif: गुज़रे

यह ग़ज़ल प्रेम, सौंदर्य और विरह के मिले-जुले अहसासों को दर्शाती है, जहाँ शायर का मानना है कि हसीनों के सानिध्य के बिना ज़िंदगी काटना मुश्किल है। साथ ही, यह महबूब की निकटता के उन पलों की बेचैनी और तड़प को भी बयां करती है जो कई बार जानलेवा इम्तिहान बन जाते हैं।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
अगर न ज़ोहरा-जबीनों के दरमियाँ गुज़रे तो फिर ये कैसे कटे ज़िंदगी कहाँ गुज़रे
अगर ज़िंदगी ख़ूबसूरत महबूबों के बीच न गुज़रे, तो फिर यह कैसे कटे और कहाँ बसर हो?
2
जो तेरे आरिज़ ओ गेसू के दरमियाँ गुज़रे कभी कभी वही लम्हे बला-ए-जाँ गुज़रे
जो लम्हे तुम्हारे रुखसार और ज़ुल्फ़ों के दरमियान गुज़रे थे, कभी-कभी वही पल जान की मुसीबत या भारी अज़ाब बन जाते हैं।
3
मुझे ये वहम रहा मुद्दतों कि जुरअत-ए-शौक़ कहीं न ख़ातिर-ए-मासूम पर गिराँ गुज़रे
मुझे एक लंबे अरसे तक यह डर और वहम रहा कि मेरे प्यार और इज़हार की हिम्मत कहीं तुम्हारे मासूम दिल पर भारी न पड़ जाए और तुम्हें दुख न पहुँचाए।
4
हर इक मक़ाम-ए-मोहब्बत बहुत ही दिलकश था मगर हम अहल-ए-मोहब्बत कशाँ कशाँ गुज़रे
यद्यपि प्रेम का हर पड़ाव बेहद सुंदर और दिलकश था, फिर भी हम प्रेम करने वाले लोग वहाँ से खिंचते-खिंचते और कष्ट झेलते हुए गुज़रे।
5
जुनूँ के सख़्त मराहिल भी तेरी याद के साथ हसीं हसीं नज़र आए जवाँ जवाँ गुज़रे
तुम्हारी याद के साथ इश्क़ के दीवानेपन के कठिन पड़ाव भी बेहद खूबसूरत नज़र आए और बड़ी आसानी और ताजगी से बीत गए।
6
मिरी नज़र से तिरी जुस्तुजू के सदक़े में ये इक जहाँ ही नहीं सैंकड़ों जहाँ गुज़रे
तुम्हारी तलाश और जुस्तजू के सदक़े में, मेरी आँखों के सामने से सिर्फ़ यही एक दुनिया नहीं बल्कि सैकड़ों दुनियाएँ गुज़र गई हैं।
7
हुजूम-ए-जल्वा में परवाज़-ए-शौक़ क्या कहना कि जैसे रूह सितारों के दरमियाँ गुज़रे
जल्वे और नज़ारों की भीड़ में तड़प व चाहत की यह उड़ान कितनी अद्भुत है, मानो कोई रूह सितारों के बीच से गुज़र रही हो।
8
ख़ता-मुआफ़ ज़माने से बद-गुमाँ हो कर तिरी वफ़ा पे भी क्या क्या हमें गुमाँ गुज़रे
मेरी ख़ता माफ़ करना, ज़माने से बदगुमान होकर मुझे तुम्हारी वफ़ा पर भी न जाने क्या-क्या शक होने लगे थे।
9
मुझे था शिकवा-ए-हिज्राँ कि ये हुआ महसूस मिरे क़रीब से हो कर वो ना-गहाँ गुज़रे
मैं जुदाई का शिकवा कर ही रहा था कि मुझे अचानक यह अहसास हुआ कि वे मेरे क़रीब से होकर गुज़र गए हैं।
10
रह-ए-वफ़ा में इक ऐसा मक़ाम भी आया कि हम ख़ुद अपनी तरफ़ से भी बद-गुमाँ गुज़रे
वफ़ा के रास्ते में एक ऐसा मोड़ भी आया जब हम खुद अपनी ही नीयत और वफ़ादारी पर शक करने लगे।
11
ख़ुलूस जिस में हो शामिल वो दौर-ए-इश्क़-ओ-हवस न राएगाँ कभी गुज़रा न राएगाँ गुज़रे
इश्क़ और चाहत का वह दौर जिसमें सच्चा ख़ुलूस शामिल हो, न तो कभी व्यर्थ बीता है और न कभी व्यर्थ बीतेगा।
12
उसी को कहते हैं जन्नत उसी को दोज़ख़ भी वो ज़िंदगी जो हसीनों के दरमियाँ गुज़रे
वह ज़िंदगी जो सुंदर लोगों के दरमियान गुज़रती है, उसी को स्वर्ग (जन्नत) भी कहा जाता है और उसी को नर्क (दोज़ख़) भी।
13
बहुत हसीन मनाज़िर भी हुस्न-ए-फ़ितरत के न जाने आज तबीअत पे क्यूँ गिराँ गुज़रे
न जाने क्यों आज कुदरती खूबसूरती के बेहद हसीन नज़ारे भी मेरे दिल और तबीयत पर इतने भारी और बोझिल महसूस हुए।
14
वो जिन के साए से भी बिजलियाँ लरज़ती थीं मिरी नज़र से कुछ ऐसे भी आशियाँ गुज़रे
मेरी नज़रों के सामने से ऐसे घोंसले भी गुज़रे हैं, जिनकी परछाईं मात्र से बिजलियाँ भी काँप उठती थीं।
15
मिरा तो फ़र्ज़ चमन-बंदी-ए-जहाँ है फ़क़त मिरी बला से बहार आए या ख़िज़ाँ गुज़रे
मेरा काम तो केवल इस दुनिया के बाग़ की देखभाल करना और उसे संवारना है, मुझे कोई परवाह नहीं कि बहार आए या पतझड़ बीत जाए।
16
कहाँ का हुस्न कि ख़ुद इश्क़ को ख़बर न हुई रह-ए-तलब में कुछ ऐसे भी इम्तिहाँ गुज़रे
वह कैसा हुस्न था जिसकी ख़ुद इश्क़ को भी ख़बर न हो सकी; तलब और चाहत के रास्ते में ऐसे इम्तिहान भी गुज़रे।
17
भरी बहार में ताराजी-ए-चमन मत पूछ ख़ुदा करे न फिर आँखों से वो समाँ गुज़रे
भरी बहार के मौसम में बाग़ की बर्बादी के बारे में मत पूछो; ईश्वर करे कि वह ख़ौफ़नाक मंज़र मेरी आँखों के सामने फिर कभी न आए।
18
कोई न देख सका जिन को वो दिलों के सिवा मुआमलात कुछ ऐसे भी दरमियाँ गुज़रे
हमारे बीच कुछ ऐसे मामले और हालात भी पेश आए, जिन्हें दोनों दिलों के अलावा कोई दूसरा कभी नहीं देख सका।
19
कभी कभी तो इसी एक मुश्त-ए-ख़ाक के गिर्द तवाफ़ करते हुए हफ़्त आसमाँ गुज़रे
कभी-कभी इसी एक मुट्ठी ख़ाक (इंसान के वजूद) के इर्द-गिर्द सातों आसमान तवाफ़ करते हुए गुज़रे हैं।
20
बहुत हसीन सही सोहबतें गुलों की मगर वो ज़िंदगी है जो काँटों के दरमियाँ गुज़रे
फूलों का साथ चाहे कितना भी खूबसूरत क्यों न हो, लेकिन असल ज़िंदगी वही है जो कांटों के बीच बसर हो।
21
अभी से तुझ को बहुत नागवार हैं हमदम वो हादसात जो अब तक रवाँ-दवाँ गुज़रे
हे दोस्त, तुम्हें अभी से वे हादसे इतने असहनीय लग रहे हैं, जो अब तक केवल तेज़ी और आसानी से गुज़रते चले गए हैं।
22
जिन्हें कि दीदा-ए-शाइर ही देख सकता है वो इंक़िलाब तिरे सामने कहाँ गुज़रे
वे बड़े बदलाव जिन्हें केवल एक शायर की दृष्टि ही देख सकती है, वे तुम्हारे सामने कभी नहीं गुज़रे।
23
बहुत अज़ीज़ है मुझ को उन्हें क्या याद 'जिगर' वो हादसात-ए-मोहब्बत जो ना-गहाँ गुज़रे
ऐ 'जिगर', प्यार के वे अचानक घटे हादसे मुझे बहुत प्रिय हैं, लेकिन भला महबूब को वे कहाँ याद होंगे।
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