ख़ता-मुआफ़ ज़माने से बद-गुमाँ हो कर तिरी वफ़ा पे भी क्या क्या हमें गुमाँ गुज़रे

“Forgive my fault—made mistrustful by this world, what doubts crossed my mind even of your fidelity!”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

मेरी ख़ता माफ़ करना, ज़माने से बदगुमान होकर मुझे तुम्हारी वफ़ा पर भी न जाने क्या-क्या शक होने लगे थे।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ अपनी एक बहुत नाज़ुक और शर्मिंदा कर देने वाली ख़ता का एतराफ़ कर रहा है। दुनिया के फ़रेब और ठोकरों से दिल इतना सहम गया था कि उसने अपने महबूब की सच्ची वफ़ा पर भी शक कर डाला। यह शेर बयां करता है कि जब इंसान ज़माने से चोट खाता है, तो अनजाने में उस कड़वाहट का साया उसके सबसे पाकीज़ा रिश्ते पर भी पड़ने लगता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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