बहुत हसीन मनाज़िर भी हुस्न-ए-फ़ितरत के न जाने आज तबीअत पे क्यूँ गिराँ गुज़रे

“Even nature's most enchanting and loveliest vistas, / I know not why, weighed so heavy on my heart today.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

न जाने क्यों आज कुदरती खूबसूरती के बेहद हसीन नज़ारे भी मेरे दिल और तबीयत पर इतने भारी और बोझिल महसूस हुए।

विस्तार

यह शेर इंसान के उस अनकहे दर्द को बयां करता है, जहाँ बाहर की खूबसूरती भी दिल को राहत नहीं दे पाती। आम तौर पर कुदरत के हसीन नज़ारे मन को सुकून और ताज़गी बख्शते हैं, मगर जब दिल किसी गहरी उदासी या तन्हाई से भरा हो, तो वही मंज़र बोझ महसूस होने लगते हैं। शायर बड़ी सादगी से समझाता है कि दुनिया का हुस्न हमारे अंदरूनी सुकून के बिना बेअसर और भारी लगने लगता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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