कभी कभी तो इसी एक मुश्त-ए-ख़ाक के गिर्द तवाफ़ करते हुए हफ़्त आसमाँ गुज़रे

“At times, around this very handful of dust, all seven heavens have passed in holy circumambulation.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

कभी-कभी इसी एक मुट्ठी ख़ाक (इंसान के वजूद) के इर्द-गिर्द सातों आसमान तवाफ़ करते हुए गुज़रे हैं।

विस्तार

'मुश्त-ए-ख़ाक' यानी मुट्ठी भर धूल, जो इंसान के नाज़ुक और नश्वर वजूद का प्रतीक है। शायर कहते हैं कि इंसान भले ही मिट्टी का एक पुतला हो, लेकिन रूहानी बुलंदी, इश्क़ या आत्म-सम्मान के खास पलों में उसका मर्तबा इतना बुलंद हो जाता है कि सारा ब्रह्मांड और सातों आसमान श्रद्धा से उसके गिर्द तवाफ़ करने लगते हैं। यह शेर इंसान की ज़ाहिरी बेचारगी के पीछे छिपी उसकी असीम गरिमा और महानता का खूबसूरत जश्न मनाता है।

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