जिगर मुरादाबादी
उनके प्रमुख काव्य संग्रहों में 'दाग़-ए-जिगर', 'शोला-ए-तूर' और 'आतिश-ए-गुल' शामिल हैं। उनकी विख्यात ग़ज़लें जैसे 'आदमी आदमी से मिलता है' और 'आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था' आज भी अदबी महफ़िलों में बेहद आदर के साथ पढ़ी जाती हैं।
मुंशी असग़र अली ख़ाँ 'बहर' की शागिर्दी में निखरे जिगर के कलाम में शास्त्रीय शिल्प और सहज संगीतमयता का सुंदर मेल है। उनकी शैली भावनात्मक गहराई, नफ़ीस लहजे और इंसानियत के खुले पैग़ाम के लिए पहचानी जाती है।
उन्हें 1958 में उनके संग्रह 'आतिश-ए-गुल' के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने भी उन्हें मानद डी.लिट्. की उपाधि से नवाज़ा था।
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