“Those revolutions that only a poet's eye can behold / How could such upheavals ever unfold before your gaze?”
वे बड़े बदलाव जिन्हें केवल एक शायर की दृष्टि ही देख सकती है, वे तुम्हारे सामने कभी नहीं गुज़रे।
यह शे’र उन खामोश तूफानों की बात करता है जो इंसानी दिल और रूह की गहराइयों में चुपचाप उठते हैं। 'दीदा-ए-शाइर' यानी शायर की नज़र इतनी बारीक और संवेदनशील होती है कि वह उन अनदेखे मोड़ों को भी भाँप लेती है जिन्हें आम आँखें नज़रअंदाज़ कर देती हैं। शायर बड़े अपनेपन से कहता है कि दुनिया या महबूब ने सिर्फ़ बाहरी तमाशे देखे हैं, जबकि दिल और सोच की दुनिया में जो गहरे इंक़लाब आए हैं, उन्हें पहचानना हर किसी के बस की बात नहीं।
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