रह-ए-वफ़ा में इक ऐसा मक़ाम भी आया कि हम ख़ुद अपनी तरफ़ से भी बद-गुमाँ गुज़रे

“Along the path of faithfulness, there came a stage so fraught, that we grew deeply doubtful even of our own heart.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

वफ़ा के रास्ते में एक ऐसा मोड़ भी आया जब हम खुद अपनी ही नीयत और वफ़ादारी पर शक करने लगे।

विस्तार

इश्क़ के रास्ते में इंसान अक्सर दुनिया या महबूब से ख़फ़ा होता है, मगर जिगर मुरादाबादी यहाँ एक बेहद नाज़ुक मोड़ की बात कर रहे हैं। इस सफ़र में इम्तिहान इतना कठिन हो गया कि शायर को किसी और पर नहीं, बल्कि अपने ही जज़्बातों और अपनी ही वफ़ादारी पर शक होने लगा। यह शेर मोहब्बत के उस दर्दनाक मुक़ाम को छूता है जहाँ सबसे बड़ी कशमकश दुनिया से नहीं, बल्कि ख़ुद अपने ही दिल से होती है।

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