अगर न ज़ोहरा-जबीनों के दरमियाँ गुज़रे तो फिर ये कैसे कटे ज़िंदगी कहाँ गुज़रे

“If it is not spent amidst radiant-browed beauties, how then could this life pass, and where?”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

अगर ज़िंदगी ख़ूबसूरत महबूबों के बीच न गुज़रे, तो फिर यह कैसे कटे और कहाँ बसर हो?

विस्तार

इस शेर में शायर बहुत सादगी से पूछते हैं कि अगर ज़िंदगी हसीन और महबूब लोगों की सोहबत में न गुज़रे, तो फिर उसे कैसे और कहाँ काटा जाए। 'ज़ोहरा-जबीन' से मुराद शुक्र तारे जैसी दमकती पेशानी वाले हुस्न से है, जो इस बेरंग दुनिया में नूर और ताज़गी भर देता है। यह एक दिलकश अहसास है कि मोहब्बत, नज़ाकत और ख़ूबसूरती के बिना यह लंबा सफ़र महज़ एक बोझ बनकर रह जाता है।

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