غزل
فلسفی کو بحث کے اندر خدا ملتا نہیں
فلسفی کو بحث کے اندر خدا ملتا نہیں
یہ غزل محض عقل، منطق اور فلسفیانہ بحثوں کے ذریعے معرفتِ الٰہی کی تلاش پر تنقید کرتی ہے۔ شاعر یہ نکتہ واضح کرتا ہے کہ جو انسان خود اپنے وجود اور باطن سے بے خبر ہو، وہ کھوکھلی بحثوں میں الجھ کر حقیقتِ مطلق اور خدا کی شناخت ہرگز حاصل نہیں کر سکتا۔
Source: rekhta · HI
نغمہ سنیں
ابھی نغمہ نہیں
1
फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं
डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं
فلسفی کو بحث کے اندر خدا ملتا نہیں
ڈور کو سلجھا رہا ہے اور سرا ملتا نہیں
2
मा'रिफ़त ख़ालिक़ की आलम में बहुत दुश्वार है
शहर-ए-तन में जब कि ख़ुद अपना पता मिलता नहीं
معرفت خالق کی عالم میں بہت دشوار ہے
شہر تن میں جب کہ خود اپنا پتا ملتا نہیں
3
ग़ाफ़िलों के लुत्फ़ को काफ़ी है दुनियावी ख़ुशी
आक़िलों को बे-ग़म-ए-उक़्बा मज़ा मिलता नहीं
غافلوں کے لطف کو کافی ہے دنیاوی خوشی
عاقلوں کو بے غم عقبیٰ مزا ملتا نہیں
4
कश्ती-ए-दिल की इलाही बहर-ए-हस्ती में हो ख़ैर
नाख़ुदा मिलते हैं लेकिन बा-ख़ुदा मिलता नहीं
کشتئ دل کی الٰہی بحر ہستی میں ہو خیر
ناخدا ملتے ہیں لیکن با خدا ملتا نہیں
5
ग़ाफ़िलों को क्या सुनाऊँ दास्तान-ए-इश्क़-ए-यार
सुनने वाले मिलते हैं दर्द-आश्ना मिलता नहीं
غافلوں کو کیا سناؤں داستان عشق یار
سننے والے ملتے ہیں درد آشنا ملتا نہیں
6
ज़िंदगानी का मज़ा मिलता था जिन की बज़्म में
उन की क़ब्रों का भी अब मुझ को पता मिलता नहीं
زندگانی کا مزا ملتا تھا جن کی بزم میں
ان کی قبروں کا بھی اب مجھ کو پتا ملتا نہیں
7
सिर्फ़ ज़ाहिर हो गया सरमाया-ए-ज़ेब-ओ-सफ़ा
क्या तअ'ज्जुब है जो बातिन बा-सफ़ा मिलता नहीं
صرف ظاہر ہو گیا سرمایۂ زیب و صفا
کیا تعجب ہے جو باطن با صفا ملتا نہیں
8
पुख़्ता तबओं पर हवादिस का नहीं होता असर
कोहसारों में निशान-ए-नक़्श-ए-पा मिलता नहीं
پختہ طبعوں پر حوادث کا نہیں ہوتا اثر
کوہساروں میں نشان نقش پا ملتا نہیں
9
शैख़-साहिब बरहमन से लाख बरतें दोस्ती
बे-भजन गाए तो मंदिर से टिका मिलता नहीं
شیخ صاحب برہمن سے لاکھ برتیں دوستی
بے بھجن گائے تو مندر سے ٹکا ملتا نہیں
10
जिस पे दिल आया है वो शीरीं-अदा मिलता नहीं
ज़िंदगी है तल्ख़ जीने का मज़ा मिलता नहीं
جس پہ دل آیا ہے وہ شیریں ادا ملتا نہیں
زندگی ہے تلخ جینے کا مزا ملتا نہیں
11
लोग कहते हैं कि बद-नामी से बचना चाहिए
कह दो बे उस के जवानी का मज़ा मिलता नहीं
لوگ کہتے ہیں کہ بد نامی سے بچنا چاہئے
کہہ دو بے اس کے جوانی کا مزا ملتا نہیں
12
अहल-ए-ज़ाहिर जिस क़दर चाहें करें बहस-ओ-जिदाल
मैं ये समझा हूँ ख़ुदी में तो ख़ुदा मिलता नहीं
اہل ظاہر جس قدر چاہیں کریں بحث و جدال
میں یہ سمجھا ہوں خودی میں تو خدا ملتا نہیں
13
चल बसे वो दिन कि यारों से भरी थी अंजुमन
हाए अफ़्सोस आज सूरत-आश्ना मिलता नहीं
چل بسے وہ دن کہ یاروں سے بھری تھی انجمن
ہائے افسوس آج صورت آشنا ملتا نہیں
14
मंज़िल-ए-इशक़-ओ-तवक्कुल मंज़िल-ए-एज़ाज़ है
शाह सब बस्ते हैं याँ कोई गदा मिलता नहीं
منزل عشق و توکل منزل اعزاز ہے
شاہ سب بستے ہیں یاں کوئی گدا ملتا نہیں
15
बार तकलीफों का मुझ पर बार-ए-एहसाँ से है सहल
शुक्र की जा है अगर हाजत-रवा मिलता नहीं
بار تکلیفوں کا مجھ پر بار احساں سے ہے سہل
شکر کی جا ہے اگر حاجت روا ملتا نہیں
16
चाँदनी रातें बहार अपनी दिखाती हैं तो क्या
बे तिरे मुझ को तो लुत्फ़ ऐ मह-लक़ा मिलता नहीं
چاندنی راتیں بہار اپنی دکھاتی ہیں تو کیا
بے ترے مجھ کو تو لطف اے مہ لقا ملتا نہیں
17
मा'नी-ए-दिल का करे इज़हार 'अकबर' किस तरह
लफ़्ज़ मौज़ूँ बहर-ए-कश्फ़-ए-मुद्दआ मिलता नहीं
معنیٔ دل کا کرے اظہار اکبرؔ کس طرح
لفظ موزوں بہر کشف مدعا ملتا نہیں
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