ग़ज़ल

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं

سب لوگ جدھر وہ ہیں ادھر دیکھ رہے ہیں
दाग़ देहलवी· Ghazal· 18 shers· radif: देख रहे हैं

यह ग़ज़ल महबूब के बेमिसाल हुस्न और उसके सम्मोहन को दर्शाती है, जहाँ पूरी महफ़िल उस पर फ़रेफ़्ता है और आशिक़ देखने वालों की नज़रों का मुशाहिदा कर रहा है। इसमें इश्क़, विस्मय और गहरी रूमानी कशिश का ख़ूबसूरत इज़हार है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं
सब लोग उसी दिशा में देख रहे हैं जहाँ वह मौजूद हैं, जबकि मैं उन देखने वालों की नज़रों को देख रहा हूँ।
2
तेवर तिरे ऐ रश्क-ए-क़मर देख रहे हैं हम शाम से आसार-ए-सहर देख रहे हैं
ऐ चाँद को भी रश्क में डालने वाले महबूब, हम तुम्हारे बदले हुए तेवर देख रहे हैं और शाम के वक़्त से ही सुबह के आसार नज़र आ रहे हैं।
3
मेरा दिल-ए-गुम-गश्ता जो ढूँडा नहीं मिलता वो अपना दहन अपनी कमर देख रहे हैं
जब मेरा खोया हुआ दिल ढूँढने पर भी नहीं मिल रहा, तो महबूब उसे अपने मुँह और अपनी कमर में तलाश कर रहे हैं।
4
कोई तो निकल आएगा सरबाज़-ए-मोहब्बत दिल देख रहे हैं वो जिगर देख रहे हैं
वे लोगों के दिल और हौसले को परख रहे हैं, ताकि प्यार में अपनी जान न्योछावर करने वाला कोई जांबाज सामने आ सके।
5
है मजमा-ए-अग़्यार कि हंगामा-ए-महशर क्या सैर मिरे दीदा-ए-तर देख रहे हैं
क्या यह बेगानों की भीड़ है या क़यामत का हंगामा? मेरी आँसू भरी आँखें कैसा अजीब तमाशा देख रही हैं।
6
अब ऐ निगह-ए-शौक़ न रह जाए तमन्ना इस वक़्त उधर से वो इधर देख रहे हैं
ऐ चाहत भरी नज़र, अब कोई इच्छा अधूरी न रह जाए, क्योंकि ठीक इसी समय महबूब वहाँ से इस तरफ़ देख रहे हैं।
7
हर-चंद कि हर रोज़ की रंजिश है क़यामत हम कोई दिन उस को भी मगर देख रहे हैं
हालाँकि हर दिन की यह रंजिश और अनबन क़यामत की तरह असहनीय है, फिर भी हम कुछ दिन इसे भी झेलते हुए देख रहे हैं।
8
आमद है किसी की कि गया कोई इधर से क्यूँ सब तरफ़-ए-राहगुज़र देख रहे हैं
क्या किसी का आगमन हो रहा है या कोई यहाँ से होकर गया है? सब लोग रास्ते की ओर क्यों देख रहे हैं?
9
तकरार तजल्ली ने तिरे जल्वे में क्यूँ की हैरत-ज़दा सब अहल-ए-नज़र देख रहे हैं
तुम्हारे रूप के प्रकटीकरण में दिव्य प्रकाश बार-बार क्यों दोहराया गया? सभी पारखी और दृष्टि वाले लोग हैरान होकर तुम्हें देख रहे हैं।
10
नैरंग है एक एक तिरा दीद के क़ाबिल हम ऐ फ़लक-ए-शोबदा-गर देख रहे हैं
हे बाज़ीगर आसमान! तुम्हारा हर एक तमाशा और खेल देखने के लायक़ है, और हम उसे देख रहे हैं।
11
कब तक है तुम्हारा सुख़न-ए-तल्ख़ गवारा इस ज़हर में कितना है असर देख रहे हैं
हम यह देख रहे हैं कि आपकी कड़वी बातें कब तक बर्दाश्त की जा सकती हैं और इस ज़हर में कितना असर है।
12
कुछ देख रहे हैं दिल-ए-बिस्मिल का तड़पना कुछ ग़ौर से क़ातिल का हुनर देख रहे हैं
कुछ लोग घायल दिल का तड़पना देख रहे हैं, जबकि कुछ लोग ध्यान से क़ातिल के हुनर और उसकी कुशलता को देख रहे हैं।
13
अब तक तो जो क़िस्मत ने दिखाया वही देखा आइंदा हो क्या नफ़ा ओ ज़रर देख रहे हैं
अब तक तो हमने वही देखा जो तक़दीर ने दिखाया, अब आगे क्या नफ़ा या नुक़सान होगा, हम यही देख रहे हैं।
14
पहले तो सुना करते थे आशिक़ की मुसीबत अब आँख से वो आठ पहर देख रहे हैं
पहले वे केवल किसी प्रेमी की मुसीबतों और दुखों के बारे में सुना करते थे, लेकिन अब वे खुद अपनी आँखों से दिन-रात उसे देख रहे हैं।
15
क्यूँ कुफ़्र है दीदार-ए-सनम हज़रत-ए-वाइज़ अल्लाह दिखाता है बशर देख रहे हैं
हे उपदेशक, महबूब का दीदार करना पाप क्यों है? जब दिखाने वाला स्वयं अल्लाह है, तो इंसान तो बस देख ही रहा है।
16
ख़त ग़ैर का पढ़ते थे जो टोका तो वो बोले अख़बार का परचा है ख़बर देख रहे हैं
वे किसी ग़ैर का ख़त पढ़ रहे थे, और जब मैंने टोका तो बोले कि यह अख़बार का पन्ना है और हम सिर्फ़ ख़बर देख रहे हैं।
17
पढ़ पढ़ के वो दम करते हैं कुछ हाथ पर अपने हँस हँस के मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर देख रहे हैं
वे कुछ पढ़-पढ़ कर अपने हाथों पर फूँक मार रहे हैं और मुस्कुराते हुए मेरे जिगर के ज़ख़्मों को देख रहे हैं।
18
मैं 'दाग़' हूँ मरता हूँ इधर देखिए मुझ को मुँह फेर के ये आप किधर देख रहे हैं
मैं 'दाग़' हूँ और आप पर मिट रहा हूँ, ज़रा इधर मेरी तरफ देखिए; आप मुझसे मुँह मोड़कर आख़िर किधर देख रहे हैं?
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