तेवर तिरे ऐ रश्क-ए-क़मर देख रहे हैं — दाग़ देहलवी

तेवर तिरे ऐ रश्क-ए-क़मर देख रहे हैं हम शाम से आसार-ए-सहर देख रहे हैं

“Watching your furrowed brow, O envy of the moon, / Ever since dusk fell, we behold the signs of dawn.”

— दाग़ देहलवी

अर्थ

ऐ चाँद को भी रश्क में डालने वाले महबूब, हम तुम्हारे बदले हुए तेवर देख रहे हैं और शाम के वक़्त से ही सुबह के आसार नज़र आ रहे हैं।

विस्तार

शायर अपने उस महबूब से मुख़ातब है जिसके हुस्न से चाँद भी रश्क करता है, लेकिन इस वक़्त उसके माथे पर नाराज़गी और बेरुख़ी के तेवर हैं। वस्ल यानी मिलन की रात अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुई थी कि माशूक़ के ग़ुस्से को देखकर आशिक़ का दिल बैठ गया। उसे लग रहा है कि जिस शाम को लंबा खिंचना चाहिए था, वहाँ अभी से जुदाई की बेरहम सुबह के आसार नज़र आने लगे हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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