क्यूँ कुफ़्र है दीदार-ए-सनम हज़रत-ए-वाइज़ — दाग़ देहलवी

क्यूँ कुफ़्र है दीदार-ए-सनम हज़रत-ए-वाइज़ अल्लाह दिखाता है बशर देख रहे हैं

“Why brand the sight of the beloved heresy, O preacher? It is God who reveals the vision, and mortals merely gaze.”

— दाग़ देहलवी

अर्थ

हे उपदेशक, महबूब का दीदार करना पाप क्यों है? जब दिखाने वाला स्वयं अल्लाह है, तो इंसान तो बस देख ही रहा है।

विस्तार

यहाँ शायर बड़े ही चुटीले और गहरे अंदाज़ में धर्मोपदेशक यानी वाइज़ से सवाल करता है कि महबूब के हुस्न को देखना गुनाह या कुफ़्र कैसे हो सकता है? उसका कहना है कि इस संसार में हर ख़ूबसूरती तो ख़ुद ऊपर वाले की ही बनाई हुई कारीगरी है, जिसे वह हमारे सामने पेश करता है। इंसान तो महज़ अपनी आँखों से खुदा के उसी नायाब हुस्न को निहार रहा है, इसलिए इस दीदार में गुनाह नहीं बल्कि रब की कुदरत की तारीफ़ छुपी है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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