ग़ज़ल
दीदा-ए-हैराँ ने तमाशा किया
دیدہ حیران نی تماشا کیا
Source: Kulliyat-e-Momin (old lithograph edition) · HI
गीत सुनें
1
दीदा-ए-हैराँ ने तमाशा किया
देर तलक वो मुझे देखा किया
हैरान आँखों ने यह तमाशा किया कि वह देर तक मुझे ही देखता रहा।
2
ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ को गह असर था किया
हौसला क्या क्या न किया क्या किया
कभी-कभी आह-ओ-ज़ारी को रोकना असर दिखा गया; मैंने कितना-कितना हौसला किया और क्या-क्या नहीं किया, आख़िर क्या किया।
3
आँख न लगने से सब अहबाब ने
आँख के लग जाने का चर्चा किया
आँखों में नींद न आने के कारण सभी दोस्तों ने यह चर्चा की कि मुझे किसी से इश्क़ हो गया है।
4
मर गए उस के लब-ए-जाँ-बख़्श पर
हम ने इलाज आप ही अपना किया
उसके जीवनदायी होंठों पर मैं मर मिटा, और इस तरह मैंने अपना इलाज खुद ही कर लिया।
5
बुझ गई इक आह में शम्अ-ए-हयात
मुझ को दम-ए-सर्द ने ठंडा किया
एक ही आह में जीवन की मोमबत्ती बुझ गई; मेरी अपनी ठंडी सांस ने ही मुझे ठंडा कर दिया।
6
ग़ैर अयादत से बुरा मानते
क़त्ल किया उन को अच्छा किया
वे मेरी बीमारी में किसी ग़ैर (प्रतिद्वंद्वी) के आने को बुरा मानते, इसलिए उन्होंने मुझे मार डाला और अच्छा ही किया।
7
उन से पर्दा-पोश को देखे कोई
मुझ को मेरी शर्म ने रुस्वा किया
उन परदा करने वाले को कोई देखे; मुझे तो मेरी अपनी शर्म ने रुसवा कर दिया।
8
ज़िंदगी हिज्र से इक मौत थी
मर्ग ने क्या कार-ए-मसीहा किया
जुदाई में ज़िंदगी एक मौत के समान थी; मौत ने तो मसीहा जैसा काम कर दिया, यानी उस पीड़ा भरी ज़िंदगी से छुटकारा दिला दिया।
9
पान में ये रंग कहाँ आप ने
आप मेरे ख़ून का दावा किया
आपके पान में यह लाल रंग कहाँ से आया? लगता है आपने मेरे ख़ून पर अपना दावा जता दिया है।
10
जौर का शिकवा न करूँ ज़ुल्म है
राज़ मेरा सब्र ने इफ़्शा किया
मैं अत्याचार की शिकायत नहीं करता, क्योंकि यह भी एक ज़ुल्म है; मेरे सब्र ने ही मेरे दिल के छिपे राज़ को ज़ाहिर कर दिया है।
11
कुछ ही बन आती नहीं क्या कीजिए
उस के बिगड़ने ने कुछ ऐसा किया
अब कुछ भी ठीक नहीं बन पड़ता, क्या करें। उसके रूठ जाने ने ऐसा कुछ कर दिया कि सब बिगड़ गया।
12
जाती थी तेरी मेरे लिए जाँ ही
ग़ैर से क्यों शिकवा-ए-बेजा किया
मेरी जान तेरे लिए जा रही थी, फिर मैंने ग़ैर से बेजा शिकायत क्यों की?
13
रहम-ए-फ़लक और मेरे हाल पर
तू ने करम ऐ सितम-आरा किया
आसमान की दया और मेरी हालत पर—तूने ऐ ज़ुल्म ढाने वाले मुझ पर कृपा की।
14
सच ही सही आप का पैमान-ए-वफ़ा
मर्ग ने कब वादा-ए-फ़र्दा किया
माना कि आपकी वफ़ा का वादा सच्चा है, लेकिन मौत ने कब कल का वादा किया है?
15
दावा-ए-तकलीफ़ से जल्लाद ने
रोज़-ए-जज़ा क़त्ल फिर अपना किया
जल्लाद ने तकलीफ़ पहुँचाने के अपने दावे के साथ, क़यामत के दिन फिर से अपने ही आप को क़त्ल कर लिया।
16
मर्ग ने हिज्राँ में छुपाया है मुँह
लो मुँह उस पर्दा-नशीं का किया
मौत ने विरह के परदे में अपना मुँह छुपा रखा था; देखो, मैंने उस परदानशीं का मुँह आख़िरकार खोल दिया।
17
दुश्मन-ए-मोमिन है सही बुत सदा
मुझ से मेरे नाम ने ये क्या किया
सच है कि बुत हमेशा से मोमिन का दुश्मन रहा है—मेरे अपने नाम ने मेरे साथ यह क्या कर दिया।
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