जौर का शिकवा न करूँ ज़ुल्म है — मोमिन ख़ाँ मोमिन
“I won't complain of cruelty—that too is tyranny; my patience has betrayed the secret hidden deep in me.”
अर्थ
मैं अत्याचार की शिकायत नहीं करता, क्योंकि यह भी एक ज़ुल्म है; मेरे सब्र ने ही मेरे दिल के छिपे राज़ को ज़ाहिर कर दिया है।
विस्तार
इस शेर में शायर खामोश दर्द की बात करता है। वह कहता है कि वह अपने ऊपर हुए जुल्म की शिकायत भी नहीं करेगा, क्योंकि ऐसे अन्याय पर चुप रहना अपने आप में एक तरह का सितम लगता है। लेकिन यहाँ एक मोड़ है। उसने अपना दर्द छिपाकर रखा, फिर भी उसके अपने सब्र ने उसे जाहिर कर दिया। जिस खामोशी से उसने सब कुछ सहा, उसी ने उसके राज़ को खोल दिया। यानी कभी-कभी हमारी चुप्पी शब्दों से भी ज्यादा बोल जाती है। जिस तरह हम खुद को रोकते हैं, वही बता देता है कि हम कितना कुछ झेल रहे हैं। यह प्यार और दर्द पर एक नाज़ुक सोच है, जो लाख कोशिश के बाद भी छिपते नहीं।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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