ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ को गह असर था किया — मोमिन ख़ाँ मोमिन
“Restraining my laments once bore some fruit indeed— what courage I summoned, and what I did not, what deeds!”
अर्थ
कभी-कभी आह-ओ-ज़ारी को रोकना असर दिखा गया; मैंने कितना-कितना हौसला किया और क्या-क्या नहीं किया, आख़िर क्या किया।
विस्तार
शायर सोच रहा है कि उसने अपनी आह और दर्द को कैसे रोके रखा। वह खुद से पूछता है कि इस चीख को दबाने से आखिर क्या असर हुआ। ज़रा सोचिए, बार-बार चुप रहने और ग़म को निगलने में कितना हौसला लगा होगा। और फिर भी, इतनी मेहनत के बाद हासिल क्या हुआ? इस शेर में एक हल्की-सी टीस है। यह उस हिम्मत की तारीफ़ करता है जो दुख छुपाने में लगती है, पर साथ ही यह भी सोचता है कि शायद वह हिम्मत बेकार गई। दर्द को भीतर रखना बड़ी ताकत माँगता है, मगर अंत में कुछ भी न बदला। यहाँ तारीफ़ भी है और अफ़सोस भी।
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